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रथयात्राः2026 से जुड़ी अन्यान्य यात्राओं की तिथियां-
वसंत पंचमीः 23 जनवरी,2026
अक्षयतृतीयाः 19 अप्रैल,2026
देवस्नान पूर्णिमाः29 जून,2026
रथयात्राः 16 जुलाई,2026
बाहुड़ा यात्राः 24 जुलाई,2026
सोनावेशः25 जुलाई,2026
अधरपणाः26 जुलाई,2026
नीलाद्रि विजयः27 जुलाई,2026

रथयात्राः2026-सात्विक और तात्विक विश्लेषणः

-अशोक पाण्डेय

श्रीजगन्नाथ पुरी में प्रतिवर्ष आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को अनुष्ठित होनेवाली भगवान जगन्नाथ की विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा जगन्नाथ-धर्म,रथारुढ़ भगवान जगन्नाथ जी के दिव्य दर्शन और उनकी अटूट भक्ति की त्रिवेणी है।रथयात्रा को गुण्डीचा यात्रा,पतितपावन यात्रा,जनकपुरी यात्रा,घोष यात्रा,नव दिवसीय यात्रा तथा दशावतार यात्रा भी कहा जाता है। जिस प्रकार पंच तत्वों-क्षिति,जल,पावक,गगन,समीरा से मानव शरीर का निर्माण हुआ है,ठीक उसी प्रकार पांच तत्वों-काष्ठ,धातु,रंग,परिधान तथा सजावटी सामग्रियों से से देवविग्रहों के रथों का निर्माण होता है। 2026 की रथयात्रा आगामी 16 जुलाई को है।पद्मपुराण के अनुसार आषाढ़ मास के शुक्लपक्ष की द्वितीया तिथि सभी शुभ कार्यों के लिए सिद्धिदात्री तिथि है। भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा आत्मचेतना का शाश्वत प्रतीक है।रथयात्रा के दिन भगवान जगन्नाथ के बड़े भाई बलभद्रजी का रथ (तालध्वज),देवी सुभद्रा का रथ (देवदलन) तथा भगवान जगन्नाथ जी का रथ(नंदिघोष) भक्त-शरीर के प्रतीक होते हैं।तीनों रथों के रथि भक्त- आत्मा के साक्षात प्रतीक होते हैं और उनके सारथी भक्त-बुद्धि के प्रतीक होते हैं।तीनों रथों के अश्वगण की लगाम भक्त-मन के प्रतीक होते हैं। रथों के सभी अश्वगण मानवीय इन्द्रियों के प्रतीक होते हैं।रथयात्रा के दिन बड़दाण्ड पर चलते रथ चतुर्धा देवविग्रहों के चलते-फिरते मंदिर के प्रतीक होते हैं। रथयात्रा विश्व का सबसे बड़ा सांस्कृतिक महोत्सव होता है जिसमें किसी भी प्रकार की भाषा,जाति,धर्म,सम्प्रदाय और प्रांत का भेदभाव नहीं होता है।इसक्रम में सबसे रोचक बात यह है कि जब कभी भी जगन्नाथ जी अपने श्रीमंदिर के रत्नवेदी से जनता-जनार्दन के बीच मित्रवत मिलने के लिए निकलते हैं तो उस दौरान श्रीमंदिर की अष्टलक्ष्मीःआदिलक्ष्मी,महालक्ष्मी,गजलक्ष्मी,धनलक्ष्मी, धैर्य लक्ष्मी, संतान लक्ष्मी,जय-विजय लक्ष्मी और विद्या लक्ष्मी उनकी प्रति क्षण रक्षा करती हैं। स्कन्द पुराण के अनुसार भगवान जगन्नाथ,नीलमाधव के रुप में शबर जनजातीय समुदाय के आदि इष्टदेव हैं।शबर संस्कृति की यह भी एक सुदीर्घ परम्परा रही है कि उनके इष्टदेव नीलमाधव पवित्र काष्ठ के ही होते हैं।शबर समुदाय अपने इष्टदेव की पूजा गोपनीय तरीके से करते हैं। इसीलिए विश्ववसु नीलमाधव की पूजा भी गोपनीय तरीके से करता था। कालांतर में पुरुषोत्तम धाम,पुरी में अवंती नरेश इन्द्रद्युम्न के कुल ब्राह्मण विद्यापति आये, जगतगुरु आदि शंकराचार्य जी आये,चैतन्य महाप्रभु आये, रामानुजाचार्यजी आये,जयदेव,नानक,कबीर और गोस्वामी तुलसीदासजी आये।वे सभी भगवान जगन्नाथ की इच्छा से आये और वे जगन्नाथ जी के अनन्य भक्त बन गये। प्रतिवर्ष रथयात्रा के दिन भोर में श्रीमंदिर के रत्नवेदी से चतुर्धादेव विग्रहों को एक-एककर पहण्डी विजय (पदहुण्ड,सेवायतों के कंधे से कंधा मिलाकर)जयघोष के साथ उनके अपने-अपने सुनिश्चित रथों पर आरुढ़ कराया जाता है। ऱथयात्रा की सारी औपचारिकताएं पूरी होने के बाद पुरी,गोवर्धनपीठ के 145वें पीठाधीश्वर जगतगुरु शंकराचार्य़ स्वामी निश्चलानंद सरस्वती जी अपने परिकरों के साथ आकर तीनों रथों पर जाकर चतुर्धा देवविग्रहों को अपना आत्मनिवेदन प्रस्तुत करते हैं। उसके उपरांत भगवान जगन्नाथ के प्रथम सेवक पुरी के गजपति महाराजा श्री दिव्य सिंददेव जी अपने राजमहल श्रीनाहर से पालकी में सवार होकर आकर छेरापहंरा करते हैं।उसके पूर्व प्रथम सेवक गजपति महाराजा रथारुढ़ चतुर्धा देवविग्रहों के दर्शन करते हैं,उनका वंदन करते हैं,कर्पूर की आरती करते हैं,आलट सेवा करते हैं,चामर सेवा देते हैं और पयरमाल ग्रहण करते हैं। रथारुढ़ बलभद्रजी का तालध्वज रथ सबसे पहले और आगे-आगे चलता है।उसके बाद सुभद्रा मां का देवदलन रथ चलता है और सबसे अंत में भगवान जगन्नाथ का नंदिघोष रथ जय जगन्नाथ और हरिबोल की गगनभेदी जयकारे के साथ चलता है। रथ खीचने का पवित्र कार्य श्रीमंदिर के सेवायतगण तथा जगन्नाथ भक्तगण ही करते हैं।लगभग तीन किलोमीटर की दूरी पर अवस्थित है गुण्डीचा मंदिर जहां आकर चतुर्धा देवविग्रह सात दिनों तक विश्राम करते हैं। भगवान जगन्नाथ अपने देवविग्रह स्वरुप में सगुण-निर्गुण,साकार-निराकार,व्यक्त-अव्यक्त और लौकिक-अलौकिक समस्त देवों के समाहार स्वरुप हैं।इसलिए उनकी विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा विश्व मानवता को सात्विकता तथा तात्विकता का पावन संदेश देती है। श्रीमंदिर प्रशासन पुरी से प्राप्त जानकारी के अनुसार 2026 वर्ष की चतुर्धा देवविग्रहों की बाहुड़ा यात्रा (श्रीमंदिर वापसी यात्रा)आगामी 24 जुलाई को है।सोनावेष 25 जुलाई को है,अधरपणा है 26 जुलाई को और नीलाद्रि विजय 27 जुलाई को है ।

अशोक पाण्डेय

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