
भारत एक संस्कृतिसंपन्न समृद्ध देश है जहां के कण-कण में लीलाधर भगवान श्री जगन्नाथ का वास है। अपनी लीलाभूमि शंखक्षेत्र में लीलाधर भगवान जगन्नाथजी अपने चतुर्धा देवविग्रह रुप,बडे भाई बलभद्र,लाडली बहन सुभद्रा,सुदर्शऩ के रुप में तथा स्वयं नारायण रुप में विराजमान हैं। वे अपने भक्तों की आस्था,विश्वास और मैत्री के विश्व के सबसे बडे ठाकुर हैं। पुरी में प्रतिवर्ष आषाढ शुक्ल द्वितीया को लीलाधर भगवान जगन्नाथ जी की विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा अनुष्ठित होती है जो विश्व का सबसे बड़ा आध्यात्मिक आयोजन होता है। वह एक सांस्कृतिक महोत्सव होता है।भगवान जगन्नाथ भारत के चारों धामों में एकसाथ विराजते हैं।इसीलिए चारों धामों में वे नाथ के रुप में जाने जाते हैं- बदरीनाथ,द्वारकानाथ,रामेश्वर नाथ तथा जगन्नाथ।बदरीनाथ में वे पवित्र स्नान करते हैं,द्वारका में वे पूर्ण श्रृंगार करते हैं ,जगन्नाथ धाम पुरी में वे 56 प्रकार के अन्न के भोगप्रहण करते हैं तथा रामेश्वरम् में वे शयन करते हैं। लीलाधर भगवान जगन्नाथजी कलियुग के एकमात्र पूर्ण दारुब्रह्म हैं जो दशावतार क्षेत्र पुरी धाम में अपने रत्नसिंहासन पर विराजमान हैं। जगन्नाथ पुरी मर्त्यबैकुण्ठ है।वे अपने बडे-बडे गोल-गोल अपलक नेत्रों से चौबीसों घण्टे पूरे विश्व को निहारते हैं। पुरी धाम का शंखक्षेत्र एक धर्मकानन है जो एकसाथ तीर्थ भी है,अन्यतम धाम भी है तथा लीलाधर भगवान जगन्नाथ क्षेत्र भी है। कहते हैं कि सत्युग का धाम बदरीनाथ धाम है,त्रेता युग का धाम रामेश्वरम् धाम है,द्वापर युग का धाम द्वारका धाम है तथा कलियुग का धाम श्री जगन्नाथधाम है।श्रीमंदिर के रत्नवेदी पर विराजमान लीलाधर भगवान जगन्नाथजी साक्षात ऋग्वेद ,बलभद्रजी सामवेद,सुभद्रा माता यजुर्वेद तथा सुदर्शन भगवान अथर्वेद हैं। श्रीमंदिर का निर्माण गंगवंश के प्रतापी राजा चोलगंगदेव ने 12वीं शताब्दी में करवाया। मंदिर की ऊंचाई 214फीट 08इंच है। यह मंदिर लगभग 11एकड भू-भाग पर अवस्थित है। यह मंदिर ओडिशा का सबसे बडा जगन्नाथ मंदिर है। यह ओडिशी स्थापत्य तथा मूर्तिकला का बेजोड प्रत्यक्ष उदाहरण है। यह मंदिर पंचरथ आकार का है।इसके शीर्ष पर पतितपावन ध्वज फहराता है। इसके चारों दिशाओं के प्रवेशद्वार महाद्वार कहलाते हैं।पूर्व दिशा का महाद्वार सिंहद्वार कहलाता है जो धर्म का प्रतीक है। पश्चिम दिशा का महाद्वार व्याग्रद्वार है जो वैराग्य का प्रतीक है। दक्षिण दिशा का महाद्वार अश्व द्वार है जो ज्ञान का प्रतीक है तथा उत्तर दिशा का महाद्वार हस्ती द्वार है जो ऐश्वर्य का प्रतीक है।श्रीमंदिर के पूर्वद्वार सिंहद्वार के ठीक सामने अरुण स्तम्भ है जिसकी ऊचाई लगभग 10 मीटर है जहां से भगवान श्री जगन्नाथजी का अपना वाहन अरुण रत्नवेदी पर विराजमान भगवान जगन्नाथ के नित्य दर्शन करता है। यह अरुणस्तम्भ 13वीं सदी में कोणार्क मंदिर में था जिसे 18वीं सदी में लाकर श्रीमंदिर के सिंहद्वार के सामने अवस्थित किया गया। श्रीमंदिर की पाकशाला संसार की सबसे बडी पाकशाला है जहां पर मात्र 45मिनट में कुल लगभग 10हजार भक्तों के लिए स्वयं माता अन्नपूर्णा देवी की देखरेख में महाप्रसाद तैयार होता है। इस पाकशाला के कुल लगभग 200 चूल्हे चौबीसों घण्टे जलते रहते हैं। महाप्रसाद पकते रहता है जिसमें लगभग 600 रसोइये जिन्हें सुपकार कहा जाता है वे महाप्रसाद पकाते रहते हैं। महाप्रसाद को भगवान जगन्नाथ को निवेदित करने के उपरांत उसे देवी विमलाजी को निवेदित किया जाता है और तब वह महाप्रसाद बनता है। इसे सामखुदी भोग भी कहते हैं। श्रीमंदिर के आनान्दबाजार(महाप्रसाद विक्री बाजार) में महाप्रसादसेवन के समय किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं होता है। सभी एकसाथ बैठकर महाप्रसादसेवन करते हैं। यह महाप्रसाद आयुर्वेदसम्मत तथा पूरी तरह से उत्तम स्वास्थ्यप्रद होता है। श्रीमंदिर में भगवान जगन्नाथ के दर्शन के लिए पधारनेवाले भक्त को सिंहद्वार के 22 सीढियों को पार कर भगवान जगन्नाथ के दर्शन होते हैं। इन 22 सीढियों में से पहली 5 सीढियां भक्त के ज्ञानेन्द्रियों –आंख,कान,नाक,मुंह,जीभ और त्वचा की शुद्धता की प्रतीक हैं। दूसरी 5 सीढियां-प्राण,अर्पण,व्यान,उदान तथा सम्मान की शुद्धता की प्रतीक हैं।तीसरी 5 सीढियां रुप,रस,स्वाद,गंध,श्रवण तथा स्पर्श की शुद्धता की प्रतीक हैं।उसके ऊपर की 5 सीढियां- पृथ्वी,जल,अग्नि,वायु और शारीरिक चेतना की शुद्धता की प्रतीक हैं। अंतिम 2 सीढियां भक्त की बुद्धि और उसके अहंकार की शुद्धता की प्रतीक हैं। श्रीमंदिर की सुदीर्घ ऐसी मान्यता है कि जबतक जगन्नाथ भक्त भगवान जगन्नाथ के दर्शन से पूर्व अपने 22 दोषों का त्याग नहीं करता है तबतक भगवान जगन्नाथ उसको उसके ज्ञान-नेत्रों से दर्शन ही नहीं देते हैं। भगवान जगन्नाथ,लीलाधर के लीलाभूमि के आकर्षण का एक और मुख्य आकर्षण श्रीमंदिर के दक्षिण-पूर्व दिशा बंगोपसागर(महोदधि) है।यहां का प्रातःकालीन सूर्योदय का दृश्य अनुपम तथा मनमोहक है। इसे सैलानियों का स्वर्ग कहा जाता है।यह महोदधि चौबीसों घण्टे भगवान जगन्नाथ के श्री चरणों के पावन स्पर्श के लिए चिघ्घाडता है लेकिन उसकी आवाज कभी भी श्रीमंदिर के मेघनाद प्राचीर के अन्दर नहीं जा पाती है। इसी महोदधि के तट पर आकर महाप्रभु आदिशंकराचार्य और अनन्य जगन्नाथभक्त विद्यापति जैसे अनेक भक्त आकर भगवान जगन्नाथ की आराधना किये हैं। इस महोदधि तट को स्वर्ण समुद्रतट कहा जाता है। यहीं पर अवस्थित है – स्वर्गद्वार घाट(श्मशान घाट) जहां पर सनातनी लोगों का अंतिम दाह-संस्कार होता है। कहते हैं कि स्वर्गद्वार में अंतिम संस्कार के उपरांत जीव की आत्मा भव-बंधन से मुक्त हो जाती है। श्री जगन्नाथ पुरी के श्रीमंदिर में भगवान जगन्नाथ 56प्रकार के अन्न-भोग करते हैं। प्रतिदिन नये-नये श्रृंगार करते हैं। साल के 21 महीनों में 13 पर्व मनाते हैं।भक्तों की प्रत्येक मनोकामना की पूर्ति करते हैं। अपने लीलाधर विग्रह रुप में विश्व के एकमात्र आस्था के देवों के देव के रुप में पूजित होते हैं। अपने इस दशावतार क्षेत्र में अपने भक्तों को दसों रुप में दर्शन देते हैं। 15नवंबर,2021 को वे अपने लक्ष्मी-नारायण रुप में द्रशन दिये। जलक्रीडा को सबसे अधिक पसंद करनेवाले भगवान जगन्नाथ चंदनयात्रा करते हैं। अपने जन्मदिन,देवस्नानपूर्णिमा के दिन महास्नान करते हैं।लीलाधर गीत-संगीत के बहुत प्रेमी हैं जो प्रतिदिन रात को सोने से पूर्व ओडिशीगीत अवश्य सुनते हैं। उनको गोटपुअ नृत्य भी बहुत पसंद है जिसे वे अपने विश्वप्रसिद्ध रथयात्रा के दिन पहण्डी विजय के समय अवश्य देखते हैं। भगवान जगन्नाथ ,लीलाधर स्वामी अहंकारी भक्त को कभी पसंद नहीं करते हैं और जबतक वे अपने भक्त को अपने दर्शन के लिए श्रीमंदिर नहीं बुलाते हैं तबतक कोई भी भक्त श्रीमंदिर में उनके दर्शन के लिए जा ही नहीं सकता है। उनको सच्चे भक्त,सज्जन,साधु,महात्मा,संन्यासी,विदेह गृहस्थ अपने सभी प्रकार के सेवायतगण बहुत पसंद हैं। 2024 से श्रीजगन्नाथ परिक्रमा गलियारा बन जाने से लीलाभूमि शंखक्षेत्र का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्त्व और बढ़ गया है।
अशोक पाण्डेय








