-अशोक पाण्डेय
संस्कृति प्रधान समृद्ध देश भारत के श्रीजगन्नाथ धाम के श्रीमंदिर के रत्नवेदी पर विराजमान हैं जगत के नाथ,महाप्रभु जगन्नाथ। वे अपनी लौकिक मानवी-लीलाभूमि धाम में अनादिकाल से जलक्रीड़ा करते हैं,अनेकानेक वस्त्रधारण करते हैं,56 प्रकार के अन्न का भोग करते हैं,ओड़िशी गीत-नृत्य सुनते हैं और अनेक लौकिक यात्राएं(उत्सव) भी करते हैं। सच कहा जाय तो लीलाधारी भगवान जगन्नाथ का एक ही अपना धाम है-श्रीजगन्नाथ पुरी धाम जहां पर वे चतुर्धा देवविग्रह रुप में विराजमान हैं। ऐसी मान्यता है कि पुरी धाम के कण-कण में विराजमान हैं भगवान श्री जगन्नाथ।इसीलिए तो पुरी धाम एकमात्र धर्मकानन है। वे वहां पर भक्तों की आस्था और विश्वास प्रत्यक्ष दारुब्रह्म हैं। वे वहां पर मैत्रीभाव के विश्व के सबसे बडे ठाकुर हैं। प्रतिवर्ष आषाढ शुक्ल द्वितीया को पुरी धाम में महाप्रभु जगन्नाथ की अनुष्ठित होनेवाली विश्वप्रसिद्ध रथयात्रा इसीलिए एक महा सांस्कृतिक महोत्सव होता है। ऐसी मान्यता है कि सत्युग में बदरीनाथ धाम बना,त्रेता में रामेश्वरम्(रामनाथ) धाम,द्वापर में द्वारकाधाम तथा कलियुग में श्री जगन्नाथधाम बना।पुरी धाम के जगन्नाथ जी साक्षात जीवित ऋग्वेद हैं जबकि बलभद्रजी सामवेद, माता सुभद्रा यजुर्वेद तथा सुदर्शनजी अथर्वेद हैं। श्रीमंदिर के शीर्ष पर पतितपावन ध्वज फहराता है। श्रीमंदिर की चारों दिशाओं के प्रवेशद्वार महाद्वार कहलाते हैं।पूर्व दिशा का महाद्वार सिंहद्वार कहलाता है जो धर्म का प्रतीक है। पश्चिम दिशा का महाद्वार व्याग्रद्वार है जो वैराग्य का प्रतीक है। दक्षिण दिशा का महाद्वार अश्व द्वार है जो ज्ञान का प्रतीक है तथा उत्तर दिशा का महाद्वार हस्ती द्वार है जो ऐश्वर्य का प्रतीक है। श्रीमंदिर की पाकशाला संसार की सबसे बडी पाकशाला है जहां पर मात्र 45मिनट में कुल लगभग 10हजार भक्तों के लिए स्वयं माता अन्नपूर्णा देवी की देखरेख में महाप्रसाद तैयार होता है।श्रीमंदिर के आनान्दबाजार(महाप्रसाद विक्री बाजार) में उपलब्ध महाप्रसादसेवन के समय किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं होता है।भगवान जगन्नाथ के दर्शन से पूर्व भक्तों को मंदिर परिक्रमा कर 22 सीढ़ियों को पारकर अर्थात् अपने 22 दोषों का त्याग करना पड़ता है। भगवान जगन्नाथ,लीलाधर के लीलाभूमि के आकर्षण का एक और मुख्य आकर्षण श्रीमंदिर के दक्षिण-पूर्व दिशा का बंगोपसागर(महोदधि) है।यहां का प्रातःकालीन सूर्योदय का दृश्य अनुपम तथा मनमोहक है। इसे सैलानियों का स्वर्ग कहा जाता है।यह महोदधि चौबीसों घण्टे भगवान जगन्नाथ के श्री चरणों के पावन स्पर्श के लिए चिघ्घाडता है लेकिन उसकी आवाज कभी भी श्रीमंदिर के मेघनाद प्राचीर के अन्दर नहीं जा पाती है। इसी महोदधि के तट पर आकर महाप्रभु आदिशंकराचार्य और अनन्य जगन्नाथभक्त विद्यापति जैसे अनेक भक्त आकर भगवान जगन्नाथ की आराधना किये हैं। इस महोदधि तट को स्वर्ण समुद्रतट कहा जाता है। यहीं पर अवस्थित है – स्वर्गद्वार घाट(श्मशान घाट) जहां पर सनातनी लोगों का अंतिम दाह-संस्कार होता है। कहते हैं कि स्वर्गद्वार में अंतिम संस्कार के उपरांत मनुष्य की आत्मा भव-बंधन से मुक्त हो जाती है। वास्तव में पुरी धाम दशावतार क्षेत्र है जहां पर भगवान जगन्नाथ अपने अपने भक्तों को दसों रुप में दर्शन देते हैं।कहते हैं कि भगवान जगन्नाथ जबतक अपने भक्तों को अपने दर्शन के लिए नहीं बुलाते हैं(चाहे भक्त पुरी धाम में ही क्यों न रहता हो)वह श्रीमंदिर में उनके दर्शन नहीं सकता है। भगवान जगन्नाथ को बिना अहंकार के सच्चे भक्त, सज्जन, साधु, महात्मा, संन्यासी, विदेह गृहस्थ तथा उनके अपने सच्चे सभी प्रकार के सेवायतगण ही बहुत पसंद हैं।
अशोक पाण्डेय