-अशोक पाण्डेय
मित्रता मूल मंत्र विचारों का मेल होता है। इसीलिए मित्रता अमीर -गरीब, छोटा- बड़ा कुछ भी नहीं देखती है। जो जितना अधिक स्वार्थी होता है वह उतना ही अधिक चापलूस होता है। एक जमींदार था। उसके चाहने वाले हजारों थे। उसके आस-पास चापलूसों की भीड़ लगी रहती थी। सभी जमींदार को कहते कि वे ही एकमात्र उसके सच्चे मित्र और अपने हैं। जमींदार ने एक रात मरने का बहाना बना लिया। सुबह जैसे हुई जमींदार की मृत्यु की खबर चारों ओर बिजली की तरह फैल गई। उस समय जो जमींदार के सबसे बड़े चापलूस थे उनमें से तीन सबसे बड़े चापलूस ने कहा कि तत्काल कफ़न से ढककर जमींदार की शव को श्मशान घाट ले जाया जाए। मुखाग्नि के लिए जमींदार का सबसे बड़ा बेटा तैयार हो गया। शव यात्रा शुरू ही हुई थी कि जमींदार अपना एक पैर शवशैय्या से बाहर लटका दिया। तीनों बड़े चापलूसों ने तत्काल पैर काटने का सूझाव दिया। तभी जमींदार उठकर बैठ गया और कहा कि उसका सच्चा मित्र इस दुनिया में कोई नहीं है। जो कहता है कि सच्चा मित्र है वह सबसे बड़ा चापलूस है।
मित्रों,आज की चापलूसी की दुनिया में झेठे चापलूसों से बचें!
-अशोक पाण्डेय








