-अशोक पाण्डेय
भारतवर्ष मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का देश है जिन्होंने सत्य मार्ग पर चलकर तपस्वी राजा के रुप में अपना त्यागी जीवन बिताया।यह भारतवर्ष शांतिदूत भगवान श्रीकृष्ण का देश है। यह देश भगवान गौतम बुद्ध का देश है। यह देश ऋषि-मुनियों का देश है।यह देश सत्य,अहिंसा और त्याग के अमर पुजारी महात्मा गांधी का देश है।इस देश में सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र का आगमन हुआ जिनके विषय में कहा गया है-
सत्यासक्त दयालु द्विज, प्रिय अघहर सुखकंद।
जनहित कमलातजन जय,शिव नृप कवि हरिचन्द।।
भारतीय गौरवशाली गुरुकुल परम्परा के तहत राजकुमारों को गुरुसेवा करने,सत्य बोलने और सदाचारी जीवन जीने की ही शिक्षा-दीक्षा दी जाती रही है।
हमारी सनातनी वर्ण(जाति)-व्यवस्था में भी ब्राह्मण,क्षत्रीय,वैश्य और शुद्र को क्रमशः विवेक,साहस,उत्पादन और सेवा क्षमताओं के आधार पर सत्य मार्ग पर चलने का पावन संदेश निहित है।
यही नहीं,श्रीरांम-रावण युद्ध में श्रीराम ने सत्य के ही मार्ग का अनुसरण किया।श्रीकृष्ण ने दुराचारी कंस के वध में सत्य का ही मार्ग चुना।भारतवर्ष के एकमात्र धर्म-युद्ध,महाभारत युद्ध में भी शांतिदूत श्रीकृष्ण ने गाण्डीवधारी अर्जुन को सत्य मार्ग पर ही चलने का अमर संदेश दिया।
हमारे अमर धर्मग्रंथः रामायण, श्रीरामचरितमानस, श्रीमद्भागवत पुराण और श्रीमद् भागवत गीता में भी समस्त भारतवासियों को सत्य को अपनाने का अमर संदेश है।
लेकिन आजाद भारत में आज-कल झूठ बोलने की संस्कृति का ही बोलबाला स्पष्ट रुप से नजर आती है।
झूठ ही लेना,झूठ ही देना।
झूठ ही भोजन,झूठ चबेना।।
ऐसे में,यह कहना गलत नहीं होगा कि आज राजा(शासक)-प्रजा(आम जनता),ब्राह्मण,क्षत्रीय,वैश्य और शूद्र सभी अकारण गर्व से और शौक से झूठ बोलते नजर आते हैं। हमारे कुछ शिक्षकगण,कुछ युवावर्ग, कुछ छोटे-छोटे बच्चे,कुछ किसान,कुछ मजदूर, कुछ नौकरशाह,कुछ कर्मचारी,कुछ कारोबारी,सभी प्रकार के सेवकगण आदि शौक से झूठ बोलते नजर आते हैं।
मुझे यह जानकारी देते हुए अत्यंत दुख हो रहा है कि कुछ ऐसे कथाव्यास भी हैं जो अपने व्यासपीठ की मर्यादा का ध्यान न रखकर,बोधात्मक कथा न सुनाकर अपने आचार-विचार और व्यवहार में झूठ बोलने की संस्कृति को बढ़ावा देते नजर आते हैं।
डॉक्टरों को दूसरा भगवान माना जाता रहा है उनमें से कुछ डॉक्टर आजकल अपनी दिनचर्या में झूठ बोलने की संस्कृति को बढ़ावा दे रहे हैं।बाजार में चले जाइए,दुकानदार से लेकर ग्राहक तक बड़ी ईमानदारी से झूठ बोलने की संस्कृति को बढ़ावा देते नजर आ रहे हैं।
हमारे वकील समुदाय में कुछ तो झूठ बोलने की संस्कृति को अपनी दिनचर्या बना लिए हैं। उन्हें आज अपने आपको बचाने की जरुरत है जिससे हमारी न्याय व्यवस्था की मर्यादा पर लोगों का विश्वास कायम हो सके।
आज समाज का कोई भी वर्ग ऐसा नहीं है जो झूठ बोलने की संस्कृति से बचा हो।इसीलिए आज सकारात्मक सोच के साथ जीवन जीना तथा सत्यनिष्ठ बनकर अपना कार्य करना तो असंभव –सा नजर आता है।
आज झूठ बोलने की गलत संस्कृति से स्वयं को बचाने के लिए तथा भारतवर्ष को विकासशील से विकसित बनाने के लिए कबीरदास की इस साखी के संदेश को अक्षरशःअपनाने की जरुरत है-
सांच बराबर तप नहीं,
झूठ बराबर पाप।
जाके हिरदै सांच है,
ताके हिरदै आप।।
-अर्थात् सत्य बोलने जैसी कोई तपस्या नहीं है और झूठ बोलने जैसा कोई पाप नहीं है। जो व्यक्ति सच बोलता है उसी के हृदय में ईश्वर का वास होता है।
इस झूठ बोलने की आज की संस्कृति जिस प्रकार व्यक्ति विशेष से लेकर पूरे भारतवर्ष के अधिसंख्यक लोगों में पल्लवित-पुष्पित हो रही है उसपर अंकुश लगाने के लिए,समस्त भारतवासी को इस संक्रामक झूठ संस्कृति से बचने के लिए गंभीरतापूर्वक चिंतन-मनन करने की जरुरत है। भारतवर्ष के सभी बच्चों व युवाओं में सत्य-संस्कार और सत्य-संस्कृति को अपनाने का संदेश देना होगा।हमें अपने आचार-विचार,व्यवहार और आचरण में सत्य को अपनाने की आवश्यकता है।बाल मनोविज्ञान के अनुसार बच्चों में अनुकरण की प्रवृति सबसे अधिक होती है।
-अशोक पाण्डेय










