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“दुख कभी भी अकेले नहीं आता है।”

-अशोक पाण्डेय

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जीवन, मनुष्य जीवन सुख- दुख,यश- अपयश और जीवन- मरण किनारों के बीच ही चलता है और चलता रहेगा। जीवन में सुख कम नसीब होता है जबकि दुख सबसे अधिक। सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग में दुख व्यक्ति के धीरज, धर्म, मित्र और अपनी पत्नी की सच्ची परीक्षा स्थान,काल और पात्र के आधार पर करता है। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम और जनकनंदिनी सीता ने तो आजीवन दुःखों का ही वरण किया। सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र ने दुख को आजीवन वरण कर दुख के शाश्वत सत्य को अपनाने का संदेश दिया। इस प्रकार के दुख से जुड़े अनेक उदाहरण हैं। मान्यवर, दुख कभी भी अकेले नहीं आता है।
-अशोक पाण्डेय

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