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महाशिवरात्रिः2026 विशेष आलेख महेश नाम स्वयं ब्रह्माजी ने भगवान शिव-शंकर को दिया।

-अशोक पाण्डेय
सृष्टि में भगवान शिव-शंकर और आदिशक्ति देवी पार्वती के शुभ विवाहोत्सव दिवस को महाशिवरात्रि कहते हैं।ओड़िशा की राजधानी भुवनेश्वर के महाप्रभु लिंगराज मंदिर समेत पूरे राज्य में फाल्गुन कृष्ण पक्ष चतुर्दशी को महाशिवरात्रि हर्षोल्लास के साथ मनाई जाएगी।महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव-शंकर की आराधना के साथ-साथ शिव-भक्तों की आत्मशुद्धि,आत्म-कल्याण तथा आत्मबोध की साधना का पवित्र दिवस है। भगवान भोलेनाथ त्रिनेत्रधारी हैं जिनका तीसरा नेत्र हमारे भक्त-जीवन के विवेक,चेतना और दूरदर्शिता को स्पष्ट करता है।महाशिवरात्रि के दिन भगवान महेश के विधिवत पूजन-अर्चन से सभी शिवभक्तों की मनोकामना पूर्ण हो जाती है। महाशिवरात्रि पर जो शिवजी नागों की माला धारण करते हैं,जो तीन आंखवाले हैं,जो भस्म से सुशोभित हैं,जो शाश्वत हैं,जो महेश्वर हैं,जो रसेश्वर हैं,जो शुद्ध और दिगबर हैं,ऐसे भगवान महेश को समस्त शिवभक्तों की ओर से कोटिशः नमन है। कहते हैं कि सृष्टि के आरंभ में जब चारों तरफ अंधकार ही अंधकार था उस समय भगवान विष्णुजी की नाभि से कमल प्रकट हुआ जिससे ब्रह्माजी उत्पन्न हुए।भगवान विष्णुजी के आदेश पर उन्होंने सृष्टि की रचना आरंभ की। पंच तत्वःपृथ्वी, आकाश,जल,वायु और अग्नि की उत्त्पति की।उसके उपरांत समस्त जीवों की रचना की जिसके संतुलन के लिए संहारक शक्ति की आवश्यकता पड़ी। इसके लिए ब्रह्माजी ने कठोर तपस्या की।और कहते हैं कि उन्हीं की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव-शंकर प्रकट हुए जिनकी जटाओं में गंगा प्रवाहित थीं,मस्तक पर चन्द्रमा सुशोभित थे,गले में सर्पों की माला थी,उनके हाथ में त्रिशूल और डमरु था तथा पूरे शरीर में भस्म था और ये सब मिलकर भगवान भोलेनाथ के संहारक स्वरुप का परिचय दिये।ब्रह्माजी ने स्वयं भगवान शिवशंकर की स्तुतिकर यह कहा कि भगवान शिव-शंकर स्वयं ही संहार ओर पुनर्निर्माण के अधिपति हैं। इसलिए मैं अर्थात् स्वयं ब्रह्माजी भगवान शिव-शंकर,आपको महेश नाम से संबोधित करता हूं। वास्तव में संस्कृत में महेश शब्द दो शब्दों से मिलकर बना हैःमहा और ईश और जिसका अर्थ है-महानतम ईश्वर। भगवान महेश त्रिगुणात्मक शक्तिःसत्व गुण,रजोगुण और तमोगुण से युक्त भगवान महेश हैं। महेश रुप में ये महाकाल हैं। ये स्वयं काल से भी परे हैं।योगी और संन्यासियों के सबसे प्रिय देव हैं-महेश।भगवान महेश का अघोरी और तांत्रिक स्वरुप उनके अघोरी तथा तांत्रिक सम्प्रदाय को स्पष्ट करता है।भगवान महेश योग और तपस्या के भी प्रतीक हैं।भगवान महेश कभी अकेले नहीं होते अपितु वे अपनी पत्नी पार्वती,शक्ति के संग होते हैं। इस सृष्टि के चर और अचर जीवों के ईश्वर भगवान महेश ही हैं। वे त्रिलोकीनाथ हैं।जिस गंगा ने 12 ज्योतिर्लिगों की रचना की उन 12वों ज्योतिर्लिगों पर महाशिवरात्रि के पवित्रतम दिवस पर भगवान महेश की विधिवत पूजा करने से समस्त शिवभक्तों का जीवन सार्थक हो जाता है।महाशिवरात्रि के दिन भगवान महेश आदिगुरु के रुप में पूजे जाते हैं।महाशिवरात्रि के दिन भगवान महेश ने अपनी पत्नी आदिशक्ति माता पार्वती से पूछा कि भार्या आज तुम ही बताओ कि जितने भी शिवभक्त मेरी पूजा कर रहे हैं क्या मैं उनसभी की मनोकामना पूर्ण कर दूं। तब आदिशक्ति देवी पार्वती ने कहा कि स्वामी आज आप अपने सभी भक्तों की मनोकामना पूर्ण कर दीजिए और भगवान महेश ने वैसा ही किया। मिली जानकारी के अनुसार भुवनेश्वर महाप्रभु लिंगराज मंदिर में महादीपदान तथा संगीत समारोह आदि की सभी तैयारियां पूरी कर लीं गई हैं।
-अशोक पाण्डेय

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