-अशोक पाण्डेय
एक तरफ जहां तुलसीकृत रामचरितमानस समन्वय की एक विराट चेष्टा है वहीं भगवान मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम भारत के धरा-धाम पर अवतरित एक मानव के रुप में मानव-जाति के आदर्श हैं। इसीलिए त्रेतायुग के श्रीराम के वास्तविक जीवन-संदेश को भारत के गांव-गांव में रामलीला के मंचन के माध्यम से विकसित करने की परम्परा सुदीर्घ रही है।प्रतिवर्ष विजयादशमी के पवित्र दिवस के कुछ दिन पूर्व से ही उत्तर भारत तथा पश्चिमबंगाल के गांव-गांव में रामलीला का मंचन आरंभ हो जाता है।व्यावहारिक रुप में रामलीला के पात्र मुख्यतः किसान ही होते हैं अथवा खेतों में काम करनेवाले लोग होते हैं जो अपने खेतों में फसल की कटाई के बाद खाली बैठ जाते हैं उनमें से ही कुछ किसान तथा खेतों में कामकरनेवाले श्रमिक आदि अपने आपको रामलीला मंचन से जोड लेते हैं। वे अपने खाली समय का सदुपयोग गांव-गांव में जाकर रामलीला करके आनंदमय तरीके से व्यतीत करते हैं। जिस किसी भी गांव में रामलीला मंचन होता है उस गांव के लोग जब रामलीला देखने के लिए इक्ट्ठे होते हैं तब रामलीला पार्टी का प्रमुख मंच से आग्रह करता है कि रामलीला के कलाकारों को प्रतिदिन खर्च वहन के लिए कोई न कोई दर्शक आगे आए।उस वक्त दर्शकों में से कुछ धनी व्यक्ति आगे आते हैं जो रामलीला पार्टी को अपनी-अपनी ओर से प्रतिदिन के भोजन आदि की व्यवस्था के लिए अपनी सहमति प्रदान कराते हैं।सबसे अच्छा यह सुनकर लगता है कि रामलीला पार्टी का प्रमुख मंच से उस दाता की जयकारा लगाता है।गगनभेदी वाद्ययंत्र बजते हैं।मंच से दाता के बाल-बच्चों की जयकारा लगता है।तालियां बजती हैं और उसके उपरांत ही रामलीला मंचन आरंभ होता है। सच कहा जाय तो आरंभ में रामलीला के मंचन की परम्परा उत्तरप्रदेश और बिहार में सबसे अधिक देखने को मिलती है।प्रतिवर्ष विजयादशमी के कुछ दिन पूर्व तथा दुर्गापूजा के समय पश्चिम बंगाल में रामलीला मंचन का प्रचलन वैसे तो आज भी देखने को मिलता है। रामलीला के मंचन की परम्परा भारत के विभिन्न राज्यों के साथ-साथ दक्षिण-पूर्व एशिया, कंबोडिया, थाईलैण्ड, श्रीलंका, इण्डोनेशिया,म्यांमार और लावोस आदि देशों में आज भी देखने को मिलती है जहां पर रामलीला का मंचन नृत्य-नाटिका अभिनय रुप में होता है।रामलीला देखनेवालों की पहली पसंद श्रीराम और दूसरी पसंद हनुमान होते हैं। रामलीला का अभिनय सबसे अधिक भावग्राही होता है,संवेदनशील होता है तथा देखनेवालों को अत्यधिक पसंद होता है।रामलीला अभिनय में जिस शाम धनुष यज्ञ,सीता-स्वयंवर,सीता-राम विवाह,रामवनगमन,रामकेवट-संवाद आदि का प्रसंग रहता है उन दिनों दर्शक भी अधिक आते हैं। वहीं जिस शाम रावण द्वारा सीता-हरण तथा राम-रावण युद्ध प्रसंग का मंचन होता है उस शाम सबसे अधिक लोग रामलीला देखने आते हैं।रामलीला के अभिनय की सबसे खास बात यह होती है कि एक परिवार के सभी सदस्य जैसे परिवार के बडे-बूढे,पति-पत्नी,युवा-युवतीआदि सभी रामलीला एकसाथ बैठकर बडे आनंद के साथ देखते हैं।रामलीला अभिनय में पात्रों के चमचमाते और आकर्षक वस्त्र, उनके आभूषण और मुकुट की मनोहारी छटा भी देखते ही बनती है।ऐसे में,रामलीला अभिनय करनेवाले सभी पात्रों के वस्त्रों के रंग, उनके मुकुटों के आकार—प्रकार आदि दर्शकों के लिए पहले ही सुनिश्चित हो जाता है कि मंच पर कौन पात्र आ रहा है।दर्शक उन्हें उनके नाम के स्वतः पहचान जाते हैं।रामलीला में संगीत की लय और ताल पर थिरकते सुवर्ण मृग, उछल—कूद करते वानर आदि का अभिनय आदि भी अनायास ही दर्शकों के दिल जीत लेते हैं। इण्डोनेशिया में तो रामलीला मंचन में सीता की अग्रि—परीक्षाप्रसंग को सबसे अधिक लोग देखते हैं क्योंकि वहां पर इस प्रसंग के अभिनय के दौरान कुल लगभग 200 से 250 पात्र एकसाथ मंचन करते हैं।सीता-अग्नि-परीक्षा प्रसंग के मंचन के समयपात्रों की मुखमूद्रा उदास,अत्यंत दुखी नजर आती है वहीं सीता के अभिनय करनेवाले पात्र के चेहरे पर दिव्य तेज झलकता है।सीता जब अग्नि में प्रवेश करती है तो साक्षात अग्निदेव प्रकट हो जाते हैं और बोलते हैं कि आज सीता के अग्नि में प्रवेश करने से ही अग्नि पवित्र हो गई। इसीप्रकार रामलीला में जब कैकेयी राजा दशरथ से तीन वर मांगती है तो राजा दशरथ जो पहले से ही बीमार थे और अधिक दुखी नजर आते हैं। इसीप्रकार सीता की खोज के प्रसंग में हनुमान, जाम्बवंत और अंगद जटायु के भाई से मिलने जाते है और पक्षियों की पीठ पर बैठकर वायुमार्ग से लंका जाकर शत्रु के राज्य को अच्छी प्रकार देखते हैं। वहां से लौटकर जटायु की गुफा में आ जाते हैं।–ये भी अभिनय लोगों को अच्छा लगता है। लावोस की रामलीला के मंचन में तो लक्ष्मण की प्रधानता देखने को मिलती है। आज एक तरफ जहां अयोध्या में श्रीराम का भव्य मंदिर बन रहा है। भगवान श्रीराम को भारतीय जीवन का यथार्थ आदर्श मानकर रामायण और रामचरितमानस की कथाओं के अभिनय के माध्यम से पूरे विश्व में राजाराम के आदर्श चरित्र का तथा उनके रामराज्य का प्रचार-प्रसार हो रहा है वहीं भारत से विकसित तथा विदेशों में अपनाई गई रामलीला मंचन की सुदीर्घ मंचन- परम्परा उत्तरोतर विकसित हो रही है वहीं भारत के विभिन्न राज्यों में यह परम्परा खत्म-सी हो रही है। इसके लिए केन्द्र सरकार तथा राज्य सरकारों को सभी रामलीला पार्टी को सरकारी मान्यता प्रदानकरने की जरुरत है।रामलीला के प्रबंधन तथा अभिनय से जुडे सभी के हितों की सरकारी की आवश्यकता है। उनके सतत प्रोत्साहन की आवश्यकता है क्योंकि राष्ट्रपिता बापू भारत में रामराज्य लाना चाहते थे।अगर बापू के अमर संदेश को पूरा करना है तो भारत में अधिक से अधिक राममंदिर अवश्य बनें लेकिन राम के आदर्शों को भारत में साकार करने के लिए अधिक से अधिक रामलीला मंचन को विकसित करने की आवश्यकता है।
अशोक पाण्डेय
रामलीला मंचन की सुदीर्घ परम्परा









