यह शाश्वत सत्य है कि लेनेवाले से बड़ा हमेशा देनेवाला होता है।यह बात ब्रह्मा जी , विष्णु जी और स्वयं कैलासपति भोलेनाथ जी ने समय -समय पर कही है। वेदव्यासकृत “महाभारत” महाकाव्य में जो कुछ भी वर्णित है वह चाहें शांतिदूत श्रीकृष्ण की बात हो,वह चाहे गाण्डीवधारी महापराक्रमी अर्जुन की बात हो या महाभारत की लड़ाई में भोजन उपलब्ध कराने वाले उदीपी नरेश की बात हो;ये सबकुछ शांतिदूत श्रीकृष्ण की लीला थी जिसमें वे सबकुछ देकर प्रसन्न थे। मेरे व्यक्तिगत अनुचिंतन के अनुसार:महाभारत युद्ध में अहम् भूमिका निभानेवाले अर्जुन थे। धर्मराज युधिष्ठिर थे और अठारह दिनों तक चलनेवाले उस महायुद्ध में प्रतिदिन भोजन उपलब्ध कराने वाले उदीपी नरेश थे। महाभारत की लड़ाई खत्म होने के बाद पाण्डवों के राज्याभिषेक के समय जब युधिष्ठिर ने उदीपी नरेश से उनके भोजन प्रबंधन का रहस्य जानना चाहा तब उदीपी नरेश ने यह जानकारी दी कि ये सारी लीलाएं शांतिदूत भगवान श्रीकृष्ण की थीं। मान्यवर, नारायण ही सर्वेश हैं। वे हमसभी से: ऋषि -मुनिगण, देवता और मानव से सत्कर्म कराकर हमारे जीवन को सार्थक बनाना चाहते हैं। इसीलिए उन्हीं की तरह आजीवन देनेवाला बनें और अगर किसी से कुछ लें तो कृतज्ञ अवश्य बनें!
आप आजीवन दाता हैं इसीलिए आप प्रातः स्मरणीय,दर्शनीय, वंदनीय और अनुकरणीय दिव्य पुरुष हैं।
-अशोक पाण्डेय









