-प्रोफेसर अच्युत सामंत
भारतीय सभ्यता के अनादि चिंतन में, शिक्षा और संस्कार,- ये दो ऐसे शब्द हैं जो हमेशा एक ही सिक्के के दो पहलू की तरह हैं, ये एक ही वस्त्र में बुने हुए दो धागों की तरह साथ-साथ रहे हैं। शिक्षा, जिसका सामान्य अर्थ ज्ञानार्जन अथवा सीखने से होता है।वहीं संस्कार में बालक के अंतःकरण अथवा आंतरिक चरित्र-निर्माण, नैतिक प्रवृत्तियाँ, विनम्रता और उदारता आदि शामिल हैं जो ज्ञान के व्यावहारिक उपयोग को आकार व स्वरुप देते हैं।जब हम एक को दूसरे से अलग करते हैं, तो हम या तो बुद्धिमान, निंदक लोग पैदा करते हैं या नेकनीयत आदर्शवादी।शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य ऐसे नागरिकों का निर्माण करना होता है जो ज्ञान को विवेक के साथ जीते हैं। हमारी लोकोक्तियों और मिथकों में प्रचलित कहानियों आदि पर विचार करें। श्रीमद्भागवद्गीता में शांतिदूत श्रीकृष्ण द्वारा वीर अर्जुन को दिया गया उपदेश वास्तविक रणनीति का पाठ है। यह वैराग्य और विनम्रता के साथ किए गए कर्तव्य पालन करने की वास्तविक शिक्षा है। महाभारत, अपने विस्तार में, धनुर्विद्या में निपुणता के साथ-साथ चरित्र की दृढ़ता की भी प्रशंसा करता है। पंचतंत्र की जीवनोपयोगी सभी कहानियों में नैतिकता का गुणगान किया गया है।सभी कहानियां बोधात्मक हैं।ये समस्त उदाहरण हमें याद दिलाते हैं कि भारतीय चिंतन ने हमेशा शिक्षा को चरित्र निर्माण में अंतर्निहित माना है,एक-दूसरे का अन्योन्याश्रय माना है। समस्त परिणामों के लिए संज्ञानात्मक कौशल (जो हम अक्सर कक्षाओं में पढ़ाते हैं) और सामाजिक-भावनात्मक शिक्षा (हृदय की दृढ़ता) के बीच एक संरक्षण होना आवश्यक है। मस्तिष्क दयालुता और अनुशासित मिट्टी में सबसे अच्छी तरह से ही विकसित होता है। अगर हम उन गुणों का नाम लें जिन्हें आज विकसित किया जाना चाहिए तो एक समूह उभर कर आता है और वह है – मानवीय सरोकार, ईमानदारी,वापस देने की आदत, नवोन्मेषी साहस,रुढ़ीवादिता व जड़ता को छोड़ने की आदत, विनम्रता, कृतज्ञता और अर्थ की अनंत मानवीय खोज अदि। आइए, उपर्युक्त पर हम संक्षेप में विचार करें। मानवतावाद शिक्षा को बहिर्मुखी बनाता है, यह सीखने को जीवन की बेहतरी का एक सक्षम संसाधन बनाता है।ईमानदारी बुद्धि को चालाकी से बचाती है। वापस देना उपलब्धि को सामाजिक उत्थान में बदल देता है। नवाचार यह सुनिश्चित करता है कि परंपराएँ स्थिर न हों, बल्कि पुराने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए नए साधनों का उपयोग करते हुए, उनमें अनुकूलता हो अपनाएं। विनम्रता विजयोन्माद को रोकती है; कृतज्ञता अधिकार-बोध को रोकती है। इसी भावना से शैक्षिक संस्थान जीवंत मूल्यों की व्यावहारिक प्रयोगशाला बन सकते हैं। मेरे विचार से,मेरा कीट( कलिंगा इंस्टीट्यूट ऑफ इंडस्ट्रियल टेक्नोलॉजी), एक क्रियाशील खाका प्रस्तुत करता है। इसकी स्थापना इस दृढ़ विश्वास के साथ की गई थी कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक पहुँच सामाजिक परिवर्तन का सबसे शक्तिशाली साधन है। कीट कठोर शैक्षणिक कार्यक्रमों को गहन सामाजिक पहुँच के साथ जोड़ता है। यही दर्शन व सिद्धांत कीट और उसकी सभी सहयोगी संस्थाएं जैसेःकीस(कलिंगा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज) में व्याप्त है। कीस, आदिवासी बच्चों के लिए दुनिया का सबसे बड़ा व पूर्णतः निःशुल्क आवासीय शिक्षण संस्थान है जो शिक्षा और संस्कार को अपने शुद्धतम रूप में प्रस्तुत करता है।कीस अपने लगभग 80,000 से अधिक आदिवासी छात्र-छात्राओं को शिक्षा, संस्कार,पोषण,उत्तम स्वास्थ्य सेवा और सांस्कृतिक संरक्षण प्रदान करता है। यहाँ साधन और साध्य अविभाज्य हैं।कीस चरित्रवान,ईमानदार और समाजहित तथा देशहित के लिए मानवनिर्माण करनेवाली विश्व की एकमात्र शैक्षिक संस्थान है,विश्व का सबसे बड़ा डीम्ड विश्वविद्यालय है। वहीं शैक्षणिक गतिविधियों और कार्यकलापों के अलावा कीट एक जीवंत छात्र समाज संस्कृति का पोषण करता है, जहाँ विविध क्लब, सांस्कृतिक संघ और नवाचार प्रकोष्ठ टीम वर्क, रचनात्मकता और नागरिक जुड़ाव को बढ़ावा देते हैं। कीट-कीस की राष्ट्रीय सेवा योजना (NSS) हर साल आर्ट ऑफ़ गिविंग, एजुकेशन फ़ॉर ऑल, न्यू माइंड्स न्यू ड्रीम्स, कन्या किरण और कलिंग फ़ेलोशिप जैसे अनेक कार्यक्रमों के माध्यम से ग्रामीण विकास, स्वास्थ्य जागरूकता अभियानों, पर्यावरण अभियानों और आपदा राहत के लिए हज़ारों छात्र स्वयंसेवकों को संगठित करती है। कीट-कीस ये दो जीवंत प्रयोगशालाएँ हैं जहाँ कर्म के माध्यम से संस्कार सीखे जाते हैं। किसी भी शैक्षिक संस्था के निर्माण के माध्यम से एक संस्थापक के समस्त शाश्वत मानवीय मूल्य,सामाजिक मूल्य,नैतिक मूल्य,प्रजातांत्रिक मूल्य किसी संस्थान के डीएनए को आकार देते हैं। मेरे अपने विश्वास, प्रत्येक जीवन की पवित्रता और बदले में कुछ देने का कर्तव्य, छात्रों को विरासत से जुड़े रखते हैं और उन्हें भविष्य के लिए तैयार करते हैं। मेरा सादगी भरा जीवन, जिसमें कोई निजी संपत्ति या धन नहीं है, अपने आप में छात्रों के लिए एक संदेश देना है कि सफलता का मापदंड उन जीवनों से है जिन्हें हम आगे बढ़ाते हैं। यह हमें बताता है कि हम अपनी नैतिकता को खोए बिना नवाचार कर सकते हैं, जोखिम उठा सकते हैं, सपने देख सकते हैं,उसे साकार कर सकते हैं और बड़ी से बड़ी उपलब्धियाँ हासिल कर सकते हैं। युवावस्था में जो लोग स्वयं के साथ, दूसरों के साथ और अपनी भावनाओं के साथ तालमेल बिठाना सीख जाते हैं, वे ही भावी जीवन में आगे बढ़ते हैं – यह अनुकूलनशीलता और भावनात्मक बुद्धिमत्ता का प्रतिबिंब है। अनुशासन आत्म-नियंत्रण का प्रतीक है। एक सकारात्मक मानसिकता भविष्य को आकार देती है और भीतर से एक प्राकृतिक चमक लाती है जो आशावाद को एक ताकत के रूप में दर्शाती है। उन अस्थायी सुखों का विरोध करना जो प्रियजनों के लिए आजीवन पीड़ा का कारण बन सकते हैं, जिम्मेदारी और दूरदर्शिता का प्रतीक है। परिप्रेक्ष्य ऊँचाई निर्धारित करता है, जिससे दृष्टिकोण सफलता का एक महत्वपूर्ण तेजस्वी बन जाता है। सच्चा विकास अकेलेपन में नहीं बल्कि दूसरों के साथ बढ़ने से, समावेशी प्रगति को अपनाने से प्राप्त होता है जो सभी को एक साथ ऊपर उठाती है। ये अमूर्त सिद्धांत नहीं हैं। ये कीट का जीवंत दर्शन हैं। यहाँ पर छात्र केवल शिक्षा प्राप्त नहीं करते अपितु वे यहां पर संस्कारों को जीते हैं, मेरे द्वारा स्थापित उदाहरण के माध्यम से मूल्यों को आत्मसात करते हैं।शिक्षा को संस्कारों के साथ जोड़ने से यह सुनिश्चित होता है कि हम न केवल सक्षम मस्तिष्कों का बल्कि कर्तव्यनिष्ठ हृदयों का भी पोषण करें। भारत में शिक्षा हमेशा से कौशल प्रशिक्षण से कहीं बढ़कर रही है; शिक्षा को संस्कारों से जोड़ना एक पवित्र कर्तव्य रहा है। मूल्यों के बिना ज्ञान जड़हीन है, और ज्ञान के बिना मूल्य शक्तिहीन हैं। जब हमारे युवा आधुनिक क्षमता से सुसज्जित होते हैं और हमारी सभ्यता के शाश्वत आदर्शों में दृढ़ होते हैं, तो वे एक आत्मनिर्भर और विश्वगुरु भारत के सच्चे निर्माता बनते हैं। यही वह मिशन है जिसे कीट-कीस के सभी छात्र-छात्राएं,शैक्षिक अधिकारीगण तथा समस्त सहयोगी प्रतिदिन जीते हैं। कीट-कीस ऐसे स्नातक तैयार करते हैं जो अपने पेशे में उत्कृष्टता प्राप्त करते हैं, अपने समुदायों की सेवा करते हैं, और हमारे भारत राष्ट्र की शाश्वत भावना को आगे बढ़ाते हैं।
लेखक-परिचयः
लेखक कीट-कीस-कीम्स के प्राणप्रतिष्ठाता है,महान् शिक्षाविद् और सामाजिक कार्यकर्ता हैं जिन्हें अबतक भारत समेत पूरे विश्व के नामी विश्वविद्यालयों से कीर्तिमान कुल 68 मानद डॉक्टरेट की डिग्री मिल चुकी है।