-अशोक पाण्डेय.
श्रीजगन्नाथ धाम पुरी में 2025 की देवस्नानपूर्णिमा आगामी 12जून,ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को है। इसे चतुर्धा देवविग्रहों की स्नानयात्रा भी कहा जाता है। इसे जगत के नाथ भगवान जगन्नाथ का जन्मोत्सव भी कहा जाता है।श्रीमंदिर के देव स्नानमण्डप पर चतुर्धा देवविग्रहों के देवस्नान पूर्णिमा मनाये जाने की परम्परा लगभग एक हजार वर्ष पुरानी तथा गौरवशाली परम्परा है। उस दिन भोर में ही श्रीमंदिर के रत्नवेदी पर विराजमान चतुर्धा देवविग्रहों, जगन्नाथ जी, बलभद्रजी, सुभद्राजी और सुदर्शन जी को पहण्डी विजय कराकर सिंहद्वार के समीप निर्मित देवस्नानमण्डप पर लाया जाता है। श्रीमंदिर प्रांगण के विमला माता के स्वर्ण कूप से 108 स्वर्ण कलश पवित्र और शीतल जल लाकर चतुर्धा देवविग्रहों को देव स्नानमण्डप पर मलमलकर नहलाया जाता है जिसे देवदारुविग्रहों का महास्नान भी कहा जाता है। 35 स्वर्ण कलश पवित्र और शीतल जल से भगवान जगन्नाथ जी को,33 स्वर्ण कलश पवित्र और शीतल जल से बलभद्रजी को,22 स्वर्ण कलश पवित्र और शीतल जल से सुभद्राजी को तथा 18 स्वर्ण कलश पवित्र और शीतल जल से सुदर्शन जी को महास्नान कराया जाता है। उसके उपरांत श्री जगन्नाथ जी के प्रथम सेवक पुरी के गजपति महाराजा श्री श्री दिव्य सिंहदेव जी अपने राजमहल श्रीनाहर से पालकी में आकर छेरापंहरा का दायित्व निभाते हैं।(देव स्नानमण्डप पर चंदनमिश्रित पवित्र जल डालकर सोने की मूठवाली झाड़ू से पंहरा(शुद्ध) करते हैं।) भगवान जगन्नाथ को उनके एक महाराष्ट्र के एक गाणपत्य विनायक भट्ट नामक भक्त की इच्छानुसार भगवान जगन्नाथ को गजानन वेष में सुशोभित किया जाता है।महास्नान अर्थात् अत्यधिक स्नान करने के चलते चतुर्धादेवविग्रह बीमार प़ड जाते हैं और उन्हें एकांत उपचार के लिए उनके बीमार कक्ष में ले जाकर रखा जाता है जहां पर उन्हें लगतार 15 दिनों तक आयुर्वेदसम्मत उपचार होता है।उन 15दिनों तक श्रीमंदिर का कपाट भक्तों के दर्शन के लिए बन्द कर दिया जाता है। उन 15 दिनों के दौरान जितने भी जगन्नाथ भक्त पुरी धाम आते हैं वे भगवान जगन्नाथजी के दर्शन पुरी से लगभग 18 किलोमीटर की दूरी पर ब्रह्मगिरि में अवस्थित भगवान अलारनाथ के दर्शन के रुप में करते हैं।गौरतलब है कि ब्रह्मगिरि में भगवान अलारनाथ की काले प्रस्तर की भगवान विष्णु की अति मोहक मूर्ति है। वहां पर उन 15 दिनों तक भगवान अलारनाथ को खीर भोग निवेदित की जाती है जिसे वहां आगत समस्त जगन्नाथ भक्त बडे चाव से भगवान जगन्नाथ के महाप्रसाद के रुप में ग्रहण करते हैं।
-अशोक पाण्डेय