-अशोक पाण्डेय
भारत एक संस्कृतिसंपन्न देश है जिसकी नींव ही सनातन धर्म पर अवलंबित है। इसीलिए प्रत्येक सनातनी परिवार किसी न किसी कुलदेवी अथवा कुल देवता की पूजा करता है जो उसकी रक्षा करते हैं।भारतवर्ष का प्रत्येक सनातनी परिवार किसी न किसी ऋषि का वंशज है। किसी भी सनातनी के गोत्र से पता चलता है कि वह किस वंश से अनादिकाल से संबधित है। अगर किसी सनातनी का गोत्र भारद्वाज है तो वह भारद्वाज ऋषि की संतान माना जाता है। मूल ऋषि से उत्पन्न संतान के लिए वे ऋषि या ऋषि पत्नी कुलदेव व कुलदेवी के रूप में पूज्य होते हैं।कई-कई सनातनी तो अपने घर पर ही अपने कुल देव अथवा देवी का मंदिर मनाकर उनकी पूजा करते हैं जिससे उस सनातनी विशेष का परिवार एक आध्यात्मिक और दिव्य पारलौकिक शक्ति से आज भी जुडा रह सके। उसके कुल देवी अथवा देवता उसकी तथा उसके परिवार की सुरक्षा कर सकें।सनातनी लोगों की आस्था और विश्वास सबसे पहले अपने कुल के अपने स्वयं के परिवार के सदस्यों से जुडी होती है और कुलदेवी और देवता किसी भी सनातनी परिवार के प्रतिनिधि माने जाते हैं।वे उस कुल के अधिष्ठाता देव अथवा देवी होते हैं। कुलदेवी अथवा कुलदेवता को वंश के संरक्षक के रूप में माना जाता है। वे उस कुल के सदस्यों की रक्षा करते हैं। कुलदेवी या कुलदेवता की प्रथम पूजा करने से परिवार में अमन-चैन तथा समृद्धि बनी रहती है। कुल देवी और देवता का सम्मान करने और उनकी कृपा पाने से पूरे परिवार पर कृपा बनी रहती है। कुलदेवी-देवता की पूजा किसी विशेष वंश के सदस्यों के बीच उसकी आध्यात्मिक संबंध की भावना को साकार करता है। अपने कुल देवी-देवता की नियमित पूजा करने से उस परिवार में सुख-शांति बनी रहती है। उस परिवार की नव विवाहित सदस्यों को अपने कुल देवी-देवता के दर्शन कराने से उनके भावी रिश्ते मजबूत होते हैं और दोनों में आजीवन सामंजस्य बना रहता है। वास्तव में कुल देवी-देवता उस विशेष कुल के आदि देवी-देवता होते हैं। वे उस कुल के रक्षक माने जाते हैं। उनके आवाहन के बिना उस कुल में कोई भी शुभ संपन्न नहीं होता है। ऐसी लोक मान्यता है कि कुलदेवी या कुलदेवता किसी भी कारण से अगर रुष्ट हो जाते हैं तो वह कुल किसी न किसी परेशानी में आ जाता है।प्रत्येक सनातनी को अपने कुल देवी-देवता के विषय में अवश्य जानना चाहिए तथा उनकी नियमित पूजा करनी चाहिए क्योंकि वे उस परिवार विशेष के रक्षक देवी-देवता ही नहीं होते हैं अपितु वे उस परिवार के सबसे बुजुर्ग सदस्य माने जाते हैं जो दैवीरुप में हमारा सतत मंगल करते हैं।लौकिक मान्यतानुसार हमारे कुलदेवी-देवता ही हैं जो हजारों वर्षों से अपने-अपने कुल को संगठित करके रखे हुए हैं।वे हमारे कुल के रक्षाकवच हैं जो किसी भी प्रकार की विध्न-बाधाओं से, नकारात्मक ऊर्जा से सर्वप्रथम संघर्ष कर हमें बचाते हैं।इसलिए प्रत्येक सनातनी को अपने कुल देवी-देवता के विषय में अच्छी तरह से जानना चाहिए तथा उनकी पूजा करनी चाहिए जिससे उस कुल अथवा परिवार की सुरक्षासहित सतत उन्नति होती रहे।वास्तव में, हमारे कुल देवी-देवता हमें आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करते हैं इसलिए प्रत्येक सनातनी को अपने-अपने कुलदेवी-देवता की पूजा पूरी आस्था,विश्वास तथा सच्ची भक्ति से करनी चाहिए।
अशोक पाण्डेय









