-अशोक पाण्डेय
हिन्दी साहित्य के आदिकाल से लेकर आधुनिक काल के अवलोकन से यह स्पष्ट हो जाता है कि साहित्य वास्तव में समाज का आईंना है।व्यक्ति और समाज के बीच अन्योन्याश्रय संबंध है जिसकी व्यावहारिक रुप में वास्तविक अभिव्यक्ति लघुकथाएं ही हैं।हिन्दी कथा-सम्राट प्रेमचंद ने कुल लगभग 302 कहानियां लिखीं जिसमें उन्होंने अपने काल्पनिक पात्रों के माध्यम से जीवन के यथार्थ को ही आदर्श बना दिया। हिन्दी कथाकार चन्द्रधर शर्मा गुलेरी ने मात्र तीन ही कहानियां लिखीं-सुखमय जीवन,बुद्धु का कांटा और उसने कहा था। लेकिन उनकी इन तीन कहानियों से हिन्दीकथा जगत में उनको अमर बना दिया।ओडिया कथाकार मनोज दास और प्रतिभा राय भी ऐसे लघु कथाकार हैं जिन्होंने अपनी-अपनी कहानियों के माध्यम से ओडिया समाज के साथ-साथ भारतीय समाज को वास्तविक जीवन का संदेश दिया है।हिन्दी कथाकार फणिश्वर नाथ रेणु ने मैला आंचल लिखकर हिन्दी साहित्य जगत में जिस आंचलिकता की नींव डाल दी उसी आंचलिकता को भारत के सभी राज्यों के कथाकार आज भी बढाया(माटी-मटाल के ओडिया कथाकार गोपीनाथ महंती से लेकर अन्य सभी भाषाओं के कथाकार और लघुकथाकार)आदि।अस्सी से दशक में लघुकथाओं के महत्त्व को थोडा कम कर दिया कार्टून और कॉमिक्स ने। और आज का युग तो पूरी तरह से सामाजिक ऐप का युग है जिसमें लघुकथाएं सचित्र पाठक मात्र कुछ मिनटों में ही पढ लेता है। फिर भी, यह कहना कोई गलत नहीं होगा कि आज का युग लघुकथाओं के लेखन और पठन का युग है।लघु कथाकार महेश दूबे की लघुकथा घर वापसी,गीता भट्टाचार्य की लघुकथा-दोस्त-दोस्त ना रहा,जया केतकी की लघुकथा-रिटायर,सरिता की लधुकथा –दिलमिजाज,पूर्णिमा ढिल्लो की लघुकथा, ज्योति गजभिये की लघुकथा-यूनिफार्म,लघुकथाकार वर्षा की कहानी-घलतफहमी,अमर त्रिपाठी की लघुकथा-मन के हारे हार है,मन के जीते जीत,मीना शर्मा की लघुकथा-झूठा सच,रानी मोटवानी की लघुकथा-मंगलसूत्र के पठन से ऐसा लगा कि जीवन की सच्चाई यही है। सुधीर ने दफ्तर से जब लता को फोन पर कहा कि उसकी मां आज दोपहर की गाड़ी से आ रहीं है तब लता के मुँह से सिर्फ ‘ओह’ निकला। “ओहक्या…”“नहींवोह…”“वोक्या….”“मैं ने मंगलसूत्र उतार कर कहीं रख दिया है। ढूंढती हूँ। तुम्हें तो पता है मैं वेस्टर्न कपड़े पहनती हूँ और इन कपड़ों के साथ मंगलसूत्र का बिलकुल मेल नहीं होता।”लता ने अलमारी में देखा, नहीं मिला । अलमारी के लोकर में देखने गई तब हड़बड़ी में पासवर्ड नंबर भूल गई। वह सोच रही थी सास वैसे तो आधुनिक है लेकिन मंगलसूत्र के मामले में बहुत सट्रिकट (नियमनिष्ठ) है। खुद बड़ा सा मंगलसूत्र पहन कर घुमती रहती है और चाहती है कि उसकी बहू भी वैसे ही रहे।खैर, लता ने रसोई में जा कर काम करना शुरू कर दिया।दोपहर में जब सासु मां आई तब कुछ परेशान लग रही थी। उनके हाथ में रुमाल था जिसमें टुटा हुआ मंगलसूत्र और काले मोती बांध के रखे हुए थे। आते ही सासु मां ने कहा “आज भीड़ में गाड़ी से उतरते वक्त खींचातानी में मंगलसूत्र टूट गया, कुछ मोती भी गिर गये।अब इसे तुरंत ठीक करवाना होगा । तुम्हें तो पता है मुझे कितनी तकलीफ होती है अगर गले में मंगलसूत्र न हो तो। अरे, बहु तुम्हारा मंगलसूत्र कहां है, टूट गया क्या?” लता ने कुछ अटक अटक कर कहा, “हं…..हू।” प्रियंका सोनी प्रीत की लघुकथा-आश्चर्य कब तक,शीलू लुनिया की लघुकथा-समाजसेवा-रीता भाभी से महौल्ले में सभी परिचित हैं आए दिन अखबारों में सुर्खियों में रहती थी विभिन्न आश्रमों में गरीब बच्चों में स्कूल यूनिफार्म हो या कापी वह सब व्यवस्था करवाते जब से ठंड बढी हैं वह कंबल वितरण कर लोगों को ठंड से बचाते आज भी जब वे कंबल बांटकर घर लौट रहे थे तो देखा उनके घर पर बहुत भीड लगी हैं जब करीब गई तो लोगो ने कहा आपके ससुरजी बरामदे में ठंड से ठिठुरते चल बसे। डॉ निरुपमा वर्मा की लघुकथा– कोहनी पर कैक्टस के कुछ अंश देखिए-पार्किंग पर स्कूटर खड़ा कर दिनेश बाजार की गली में घुस गया । जहां भीड़ अधिक थी । वह अक्सर भीड़ भाड़ वाली जगह देखता और मौका पाकर जवान लड़कियों को कोहनी मारकर फर्राटे से भीड़ में गायब हो जाया करता । जवानी में पहली बार बस में धोखे से उसकी कोहनी एक लड़की को लग गई थी , तब उसने तुरंत क्षमा मांग ली थी । किंतु उसको एक अजीब सी सुखद अनुभूति हुई थी । उसी क्षणिक सुख के लिए फिर तो वह अक्सर भीड़ वाली जगह पर जानबूझ कर जाने लगा । और मौका पाते ही जवान लड़कियों को कोहनी मार कर चलता था ।अब यह उसकी आदत सी बन चुकी थी , एक नशा सा था उसको । हालाँकि अब उसकी आंखों पर मोटे फ्रेम का चश्मा चढ़ चुका था , कनपटी के बाल भी सफेद हो गए थे । फिर भी ……। बाजार की गली में घुसते ही दिनेश ने देखा – जूस वाले की दुकान पर कुछ लड़कियां खड़ी जूस खरीद रही थीं । उसकी आंखें चमकने लगी व तेजी से चलता हुआ उनके पास गया और एक लड़की को कोहनी मारकर आगे बढ़ गया ।तभी पीछे से लड़की की आवाज सुनाई दी- “ अंकल जी !जरा देख कर चलिए “..।आवाज़ सुनकर वह एकाएक चौंक गया । पलट कर देखा … …और जाने क्यों आज उसे अपनी कोहनी पर कैक्टस के ढेरों बारीक़ कांटें चुभते हुए से महसूस हुये । ‘ अंकिल!कह कर सम्बोधित करने वाली लड़की -’ नेहा थी । ……नेहा ..!!! “ मेरी बेटी …”।आज के लघुकथा लेखन और पठन के युग में वास्तिवक रुप से प्रोत्साहन का कार्य भारतीय प्रजातंत्र का चौथा संतभ –समाचारपत्र कर रहा है। आज के उभरते हुए लघु कथाकार कर रहे हैं।आज आवश्यकता इस बात की है कि लघुकथाकारों को जनहित,समाजहित,लोकहित और राष्ट्रहित के लिए उन्हें अधिक से अधिक प्रोत्साहित किया जाय क्योंकि समसामयिक जीवनोपयोगी लघु कथाओं की प्रासंगिकता कल भी थी ,आज भी है और आनेवाले दिनों में भी रहेगी।
-अशोक पाण्डेय









