-अशोक पाण्डेय
——————–
श्रेष्ठता को परिभाषित करना बहुत कठिन है। फिर भी चरित्रवान, प्रतिभावान मानसिक रूप से संयमी और शारीरिक रूप से त्यागी व्यक्ति ही सर्वश्रेष्ठ होते हैं। उपर्युक्त असाधारण गुणों के अलावा वह व्यक्ति भी सर्वश्रेष्ठ होता है जो अपने आलोचकों का प्रत्युत्तर आलोचना से नहीं देता है।
एक सद्गुरु अपने शिष्यों की प्रैक्टिकल एग्जाम लेने के लिए उस गांव में गये जहां का प्रत्येक व्यक्ति गांव में आने वालों की आलोचना करता था। गुरुजी, गांव के बाहर डेरा डाल दिए और अपने शिष्यों को गांव में जाने को कहा। सभी शिष्य जैसे गांव में गये। उनके प्रवेश करते ही गालियों की बौछार झेली। जब शाम को वापस लौटे तो एक को छोड़कर सभी ने गुरुवार से तत्काल गांव छोड़ने का अनुरोध किया पर एक शिष्य ने उस गांव में और अधिक दिन रहने का निवेदन इसलिए किया कि वह अपनी आलोचना से अपने को सुधाकर सर्वश्रेष्ठ बन सके। सद्गुरु ने उस शिष्य का सुझाव स्वीकार कर उस गांव में रहे और जब वे अपने शिष्यों के लेकर वापस लौटे तो सभी अपनी अपनी दुर्बलताओं से मुक्त हो चुके थे।
-अशोक पाण्डेय








