Header Ad

Categories

  • No categories

Most Viewed

हिन्दी कवि सम्मेलन आयोजन की एक लंबी यात्राः एक समीक्षा

-अशोक पाण्डेय
हिन्दी कविता का आरंभ वियोग और करुणा से हुआ जो आज हास्य-विनोद और व्यंग्य के रुप में अपनी लोकप्रियता और वाहवाही खूब बटोर रहा है। हिन्दी साहित्य के आदिकाल से लेकर आधुनिक काल के अवलोकन से यह स्पष्ट हो जाता है कि हिन्दी साहित्य में हिन्दी कविता की विधा ने अपने उद्भव और विकास ने हिन्दीप्रेमी पाठकों को एकतरफ जहां साहित्य महोत्सव का आनंद दिया वहीं हिन्दी भाषा-भाषियों को आनंद के साथ-साथ मेल-मिलाप तथा टी-पार्टी आदि का सुनहला अवसर भी प्रदान किया।पहले तो हिन्दी कवि एक कमरे में बैठकर,बाग-बगीचे में बैठकर तथा चाय की दुकान पर खडे होकर हिन्दी कवितापाठ किया करते थे और लोग सुना करते थे।धीरे-धीरे कवितामंचन का युग आरंभ हुआ जिसमें कवियों ने बंद करने से निकलकर हिन्दी कविसम्मेलनों के माध्यम से अपनी पहचान बनाई। आज के सबसे लोकप्रिय हिन्दी कवि डॉ.कुमार विश्वास को ही ले लें जो एक कवि सम्मेलन में अपनी कवितापाठ के लिए लाखों रुपये लेते हैं। सभी का भरपूर मनोरंजन करते हैं।हिन्दी कवितावाचन के अनेक रुप हैं।जैसेःस्वरचित कवितापाठ, कविगोष्ठी और कविसम्मेलन आदि।आज का युग तो हिन्दी हास्य-व्यंग्य कविसम्मेलन का युग बन गया है जिसमें टेलीविजन के कवि सम्मेलन कार्यक्रम से लेकर राष्ट्रीय टीवी चैनलों पर भी समय-समय पर (होली,दीवाली,दशहरा और हिन्दी दिवस आदि)पर अनेकानेक हिन्दी कविसम्मेलन का विराट,सुंदर और लोकप्रिय आयोजन होने लगा है। यही हिन्दी कविसम्मेलन अगर किसी गांव अथवा कस्बे में आयोजित होता है तो उस गांव तथा उस कस्बे के आसपास के गांवों तथा कस्बे के लोग भी हिन्दी कवि सम्मेलन में स्वेच्छा से जरुर जाते हैं और रातभर हिन्ही कविता सुनते हैं। भारत का पहला हिन्दी कवि सम्मेलन 1923 में कानपुर,उत्तरप्रदेश में आयोजित हुआ था जिसे गयाप्रसाद ‘सनेही’ ने आयोजित कराया था और उसमें कुल 27 हिन्दी कवियों ने हिस्सा लिया था।वास्तव में आयोजित हिन्दी कवि सम्मेलनों ने हिन्दी कविता-संसार को काफी समृद्ध बना दिया है।कविता के मानक विभिन्न रसों को लोकप्रिय बना दिया है।आज भारत के जितने भी हिन्दी कथावाचक और नामी व्यास हैं वे हिन्दी कविता के सस्वर वाचन के माध्यम से रामचरितमानस की रामकथा तथा श्रीमद्भागवत कथा को जन-जन का कण्ठहार बना रहे हैं।रामायण वंदना की कुछ पंक्तियों को देखें-हमें निज धर्म पर चलना, बताती रोज रामायण। सदा शुभ आचरण करना,सिखाती रोज रामायण।सरल कविता की कुंजों में बना मंदिर है हिन्दी का,जहां प्रभु प्रेम का दर्शन कराती रोज रामायण। जिन्हें संसार-सागर से उतरकर पार जाना है,उन्हें सुख से किनारे पर लगाती रोज रामायण। गौरतलब है कि 1870 में भारतेंदु हरिश्चंद्र ने कविता वर्धनी संस्था बनाई थी जो पहली हिन्दी कवि गोष्ठी थी। हिन्दी कवि सम्मेलनों के आयोजन ने आज देश की आम जनता को न केवल हिन्दी से अपितु भारतीयता से जोड़ दिया है।भारतीय संस्कार और संस्कृति से जोड दिया है।आज तो भारत के विभिन्न राज्यों समेत अमरीका,आस्ट्रेलिया, रुस(मॉस्को), ब्रिटेन(इंग्लैण्ड), मॉरीश्स, कनाडा तथा दुबई जैसे अनेक देशों में हिन्दी कवि सम्मेलन आयोजित हो रहे हैं। हिन्दी कवियों में मैथिलीशरण गुप्त, रामधारी सिंह ’दिनकर’, जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी ’निराला’, गिरिजा कुमार माथुर,सोहनलाल द्विवेदी, हरिवंश राय बच्चन आदि जैसे अनेक हिन्दी के कवियों ने हिन्दी कविता की श्रीवृद्धि की है।हिन्दी कवि सम्मेलनों का आयोजन जिस किसी भी उद्देश्य से हो,उसके आयोजन के मूल में हिन्दी कविता की लोकप्रियता को सतत बढाना तथा हिन्दी कवियों को प्रोत्साहित करना ही है। उसे मनबहलाव का अनुशासित माध्यम बनाना ही मुख्य उद्देश्य है।इस वर्ष(2023) में भी आनेवाले स्वतंत्रता दिवस(15 अगस्त)तथा हिन्दी माह को ध्यान में रखकर देशभक्ति पर आधारित हिन्दी कविताओं,वीररस, शांतरस,श्रृंगार रस और रौद्ररस आदि कविता लेखन की तो जैसे बाढ-सी आ गई है।हिन्दी कवि सम्मेलन का पहला युग 1947 से लेकर 1980 तक का युग माना जाना चाहिए।दूसरा युग 1980 से दशक के मध्य से लेकर 1990 के दशक का युग।उस दौरान देशभक्ति तथा देशप्रेम पर आधारित ही अधिकांश हिन्दी कविसम्मेलन आयोजित हुए। लेकिन जैसे-जैसे भारत में जनसंख्या विस्फोट हुआ और देश के युवाओं में बेरोजगारी बढी तो हिन्दी कवि सम्मेलनों के आयोजन का विषय भी पूरी तरह से बदल गया और वह जनसंख्या और बेरोजगारी आदि तक सिमटकर रह गया।उसके बाद के समय में विभिन्न टेलीविज़न चैनलों,सोसल मीडिया, हिन्दी फिल्मों आदि में हिन्दी कवि सम्मेलनों के आयोजनों में कमी आई। सच कहा जाय तो 2000 से लेकर 2023 तक का समय हिन्दी कवि सम्मेलनों के आयोजन का दूसरा सुनहला काल सिद्ध हुआ है(बीच में लगभग दो साल तक वैश्विक महामारी कोरोना संक्रमण काल के समय को छोडकर)।अब तो ऐसा लगने लगा है कि आज के हिन्दी कवि सम्मेलनों में तो आज का श्रोता ही हिन्दी कवियों से कहीं अधिक जागरुक हो चुका है।आज तो हिन्दी कवि सम्मेलनों के बढते हुए श्रोताओं की संख्या (राजनेता से लेकर उद्योगपति तथा हिन्दीप्रेमी आदि तक)यह सिद्ध करती है कि हिन्दी कविता में गुणवत्ता का होना परम आवश्यक है।वास्तविक और मर्यादित हास्य-व्यंग्य-बाण का होना जरुरी है। पहले तो हिन्दी कवि सम्मेलन हिन्दी दिवस,हिन्दी सप्ताह,हिन्दी पखवाडा,हिन्दी माह,सामाजिक कार्यक्रमों, कॉर्पोरेट उत्सवों तक सीमित थे लेकिन वह आज के शैक्षिक क्रांति के युग में सभी की पहली पसंद बन चुके हैं।सच कहा जाय तो आज के हिन्दी कवि सम्मेलनों का स्वरुप बदल चुका है फिर भी, नीरज,शैल चतुर्वेदी,काका हाथरसी,हुल्ड मुरादाबादी,बालकवि बैरागी, सुरेन्द्र शर्मा,अशोक चक्रधर,हरिओम पंवार,शैलेश लोडा,दिनेश रघुवंशी तथा विष्णु सक्सेना आदि जैसे अनेक हिन्दी के कवियों की कविताएं लोग रातभर सुनते हैं।
-अशोक पाण्डेय

    Leave Your Comment

    Your email address will not be published.*

    Forgot Password