ओड़िशा प्रदेश की व्यापारी नगरी कटक के मशहूर कारोबारी डॉ विजय खण्डेलवाल का आज,12 सितंबर को हैप्पी बर्थडे है।उनके जन्मदिन पर उनके समस्त हित-मित्रों,सगे-संबंधियों तथा समस्त शुभचिंतकों की ओर से उनको बहुत-बहुत बधाई तथा अनेकानेक हार्दिक शुभकामनाएं।उनके सफल कारोबार से लेकर उनके जनसेवा,समाजसेवा,लोकसेवा तथा ईश सेवा आदि तक की यात्रा अत्यंत प्रशंसनीय तथा उल्लेखनीय रही है।भुवनेश्वर में वे इस्पात तथा लौह अयस्क ट्रेडिंग का कारोबार करते हैं।उनकी धर्मपत्नी विमलेश खण्डेलवाल ही उनके सफल जीवन की सच्ची प्रेरणा हैं।कटक,तुलसीपुर,गीताज्ञान मंदिर(चारों धाम) में तो डॉ.विजय खण्डेलवाल के प्राण बसते हैं। गीताज्ञान मंदिर में समय-समय पर वे आध्यात्मिक आयोजन कराते हैं।पिछले लगभग दो सालों से उनका मन पूरी तरह से श्रीजगन्नाथ पुरी, वृंदावन,मथुरा,हरिद्वार,अयोध्या और काशी में ही रमा हुआ है। राधारानी की बरसाने नगरी तो उनके आध्यात्मिक जीवन के आधार बन चुकी है। डॉ. विजय खण्डेलवाल ओड़िशा के सबसे बड़े मारवाड़ी समाज ,कटक मारवाडी समाज के 2015 से लगातार दो अवधि तक अध्यक्ष रह चुके हैं।वे अपने दोनों कार्यकालों में युवाशक्ति और मातृशक्ति को भरपूर बढावा दिए हैं।युवा मेधाशक्ति तथा युवा कौशल विकास शक्ति आदि को प्रोत्साहित किए हैं। वे समाज के सभी बडे-बुजुर्गों,गुरुजनों तथा ब्राह्मणों का सदा आदर-सम्मान करते हैं।इसीलिए समाज में उनके प्रति सभी की सच्ची श्रद्धा है।आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का कथन है कि किसी व्यक्ति विशेष के प्रति समाज की श्रद्धा के तीन आधार होते हैं-पहला,उस व्यक्ति विशेष की प्रतिभा,दूसरा,उसका चरित्र और तीसरी उसकी सम्पदा व मान-मर्यादा। डा विजय खण्डेलवाल के पास तीनों हैं इसीलिए सभी उनके प्रति श्रद्धा रखते हैं। उनके लोकप्रिय सामाजिक जीवन की कामयाबी का मूल आधार है उनका अत्यंत संवेदनशील होना तथा करुणभाव से ओतप्रोत होना। उनकी तीन बेटियां हैं: कीर्ति ,श्वेता और तनीशा हैं जिनमें से दो की शादी हो चुकी है। वे अपने –अपने ससुराल में सानांद हैं। मझली बेटी श्रीमती श्वेता को हाल ही में बेटा हुआ है जिसके लिए डॉ विजय खण्डेलवाल तथा उनकी पत्नी श्रीमती बिमलेश खण्डेलवाल ने दिल खोलकर मिठाइयां बांटीं तथा अनेक प्रकार के पूजा-पाठ तथा दान-पुण्य किए। डॉ विजय खण्डेलवाल का यह मानना है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में सबसे पहले प्रतिभावान बनकर धनोपार्जन करना चाहिए। मान-सम्ना के साथ जीना चाहिए तथा समय आने पर सद्गुरु की प्रेरणा से आध्यात्मिक जीवन अपना लेना चाहिए और उसी में ही मानव-जीवन की सार्थकता निहित है।
डॉ. विजय खण्डेलवाल के जन्मदिन पर








