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“धर्म आपके दैनिक जीवन की दिनचर्या में समाहित है न कि किसी आध्यात्मिक पुस्तक में ,न ही किसी सिद्धांत में, न ही किसी मतमतांतर में, न ही किसी वाणी में और न ही किसी तर्क-वितर्क में।यह भारतीयता पर आधारित उचित जीवन-शैली है.आपकी दिनचर्या में ही धर्म को स्वयं ‘होना’ और ‘बनना’देखा जा सकता है।
जय शिवशंकर!








