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“ज्ञानी के साथ साथ आत्मज्ञानी बनें!”

-अशोक पाण्डेय

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एक छोटा बालक जब ईश्वर से प्रार्थना करता है तो कहता है:
हे प्रभु आनंददाता ज्ञान हमको दीजिए, लीजिए हमको शरण में हम सदाचारी बनें।”बालक ज्ञान चाहता है, ऐसा ज्ञान जिसे प्राप्त कर वह अच्छे- बुरे लोगों को जान सके। वह अच्छे-बुरे की पहचान कर सके। साथ ही साथ बालक अपने आपकी समीक्षा कर आत्मज्ञानी बन सके। श्रीरामचरितमानस के सुंदर काण्ड में पवनपुत्र हनुमान इसी ज्ञान और आत्मज्ञान का पावन संदेश देते हैं। इसीलिए मान्यवर,आप भी सही अर्थों में उसी रूप में ज्ञानी और आत्मज्ञानी बनें!
-अशोक पाण्डेय

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