प्राचीन यूनानी विचार अरस्तू ने कहा था कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। उसका सर्वांगीण विकास सिर्फ और सिर्फ समाज में ही संभव है। इसलिए प्रत्येक बुद्धिजीवियों, समाजसेवियों और
लक्ष्मीपुत्रों को अपने समाज के सर्वांगीण विकास के लिए पूर्णतः सहयोग करना चाहिए। समाज की वर्ण व्यवस्था के विषय में भी अरस्तू ने क्रमशः विवेक,साहस, उत्पादकता तथा सेवा जैसे विशिष्ट गुणों के आधार पर क्रमशः चार वर्णों में बांटा है: ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र।
मान्यवर, आध्यात्मिक विश्व गुरु स्वामी विवेकानंद जी ने भी समाज के प्रति सभी की नैतिक जिम्मेदारी की बात कही है। इसलिए आप अपने परिवार ,समाज, प्रदेश, राष्ट्र,मानव और मानवता के लिए कुछ अच्छा सोचें, विचार करें और करें अवश्य!
-अशोक पाण्डेय











