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भारत के अन्यतम पुरी धाम में अक्षय तृतीया की परम्पराः

अशोक पाण्डेय
वैशाख मास के शुक्लपक्ष की तृतीया को अक्षयतृतीया माना जाता है। यह सबसे फलदायी तृतीया है। सांस्कृतिक प्रदेश ओड़िशा की सांस्कृतिक नगरी,शंखक्षेत्र पुरीधाम में प्रतिवर्ष अनुष्ठित होनेवाली अक्षयतृतीया का पौराणिक,आध्यात्मिक,सांस्कृतिक तथा सामाजिक महत्त्व अनादिकाल से है।2026 की अक्षयतृतीया 20अप्रैल को है।अक्षय तृतीया को युगादितृतीया भी कहते हैं।अक्षय तृतीया त्रैतायुग तथा सत्युग के शुभारंभ की संदेशवाहिका है।प्रतिवर्ष अक्षयतृतीया के दिन से ही भगवान बदरीनाथजी का कपाट उनके भक्तों के दर्शन के लिए खोल दिया जाता है।शांतिदूत भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं धर्मराज युधिष्ठिर को अक्षयतृतीया महात्म्य की कथा सुनाई थी।अक्षय तृतीया के दिन ही द्वारकाधीश के बाल सखा सुदामा उनसे मिलने के लिए द्वारका गये थे।स्कन्द पुराण के वैष्णव खण्ड के वैशाख महात्म्य में यह स्पष्ट उल्लेख है कि जो वैष्णव भक्त अक्षयतृतीया के सूर्योदयकाल में प्रातः पवित्र नदी,महोदधि,पुष्करिणी स्नानकर भगवान विष्णु की विधिवत पूजा करता है और भगवान जगन्नाथ की माधुर्य लीला और ऐश्वर्य लीला की कथा सुनता है वह मोक्ष को प्राप्त होता है। ओड़िशा प्रदेश तथा विशेषकर पुरीधाम में प्रति वर्ष अनुष्ठित होनेवाली अक्षयतृतीया की बड़ी ही सुदीर्घ तथा गौरवशील परम्परा रही है।सबसे बड़ी बात यह है कि भारत के सांस्कृतिक प्रदेश ओड़िशा के घर-घर,गांव-गांव और शहर-शहर में अक्षयतृतीया पूरी श्रद्धा,आस्था और विश्वास से मनाई जाती है।इसीलिए अक्षयतृतीया को ओड़िया लोक आस्था और विश्वास का प्रतीक माना जाता है। प्रतिवर्ष अक्षयतृतीया के पवित्र दिवस पर पुरीधाम में एकसाथ तीन शुभ कार्य आरंभ किये जाते हैं। पहलाः भगवान जगन्नाथ की विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा के लिए तीनों नये रथों के निर्माण का कार्य अक्षयतृतीया के दिन से ही पुरी के गजपति महाराजा तथा भगवान जगन्नाथ के प्रथम सेवक श्रीश्री दिव्य सिंहदेवजी महाराजा के राजमहल श्रीनाहर के समीप रथखला में आरंभ होता है।अक्षयतृतीया के दिन से ही भगवान जगन्नाथ की विजय प्रतिमा मदनमोहन एवं अन्य देवों की 21 दिवसीय बाहरी चंदनयात्रा पुरी के चंदन तालाब में अनुष्ठित होती है।अक्षय तृतीया के दिन से ही ओड़िशा के किसान अपने-अपने खेतों में जोताई-बोआई का कार्य आरंभ करते हैं जिसके एकमात्र प्रतिनिधि के रुप में ओड़िशा के मान्यवर मुख्यमंत्री श्री मोहन चरण माझी द्वारा अपने हाथों से हल चलाकर उसकी शुरुआत होती है। प्रतिवर्ष अक्षयतृतीया के दिन पुरीधाम में भगवान श्रीजगन्नाथजी को चने की दाल का भोग निवेदित किया जाता है जो सबसे शुभकारी माना जाता है। ऐसा भी कहा गया है कि समस्त सनातनी लोग अपने पूर्वजों की आत्मा की चिर शांति हेतु अक्षय तृतीया के दिन फल-फूल आदि का दान करते हैं।जो भक्त अक्षय तृतीया के दिन सायंकाल भगवान जगन्नाथ को शर्बत निवेदित करता है वह अपने सभी पापों से मुक्त हो जाता है।अक्षय तृतीया के दिन जगन्नाथ भगवान की कथा-श्रवण एवं दान- पुण्य का अति विशिष्ट महत्त्व होता है।अक्षयतृतीया के दिन जो भक्त उस दिन महोदधि पवित्र स्नान कर भगवान जगन्नाथ की विधिवत पूजा करता है वह अपने पूरे कुल का उद्धारकर बैकुण्ठ लोक को प्राप्त होता है।
21 दिवसीय बाहरी चंदनयात्राः
श्री जगन्नाथपुरी धाम(ओड़िशा) में भगवान जगन्नाथ की विजय प्रतिमा मदनमोहन एवं अन्य देव-देवियों आदि की 21दिवसीय बाहरी चंदनयात्रा अक्षय तृतीया से पुरी के चंदन तालाब में प्रतिवर्ष अनुष्ठित होती है।चंदन तालाब को नरेन्द्र तालाब भी कहा जाता है।चंदनयात्रा के समय चंदन तालाब को पूरी तरह से स्वच्छ तथा उसके आसपास की जगह को साफ-सूथराकर उसे बिजलीबत्ती की रोशनी से आलोकित कर दिया जाता है।जल प्रिय भगवान जगन्नाथ की विजय प्रतिमा मदनमोहन की चंदनयात्रा उसी का प्रत्यक्ष प्रमाण है।उन 21 दिनों तक भगवान जगन्नाथ अपनी विजय प्रतिमा मदनमोहन के रुप में एक साधारण मानव की तरह ही मानव शरीर के शरदी-गर्मी का अनुभव करते हैं।वे वैशाख-जेठ मास की भीषण गर्मी से परेशान होकर चंदन तालाब में कुल 21 दिनों तक शीतलता हेतु चंदन का लेप लगाकर मलमलकर स्नान करते हैं।नौका विहार करते हैं और कुछ देर तालाब के बीचोंबीच निर्मित अपने चंदनघर में अपराह्न से लेकर मध्यरात्रि तक विश्राम करके प्रतिदिन अपने श्रीमंदिर वापस लौट आते हैं।वे अक्षय तृतीया के दिन से श्रीमंदिर की समस्त रीति-नीति के तहत जातभोग संपन्न कर अपराह्न बेला में मदनमोहन,रामकृष्ण,बलराम,पंच पाण्डव, लोकनाथ, मार्कण्डेय, नीलकण्ठ, कपालमोचन, जम्बेश्वर,लक्ष्मी,सरस्वती आदि को अलौकिक शोभायात्रा के मध्य पुरी नगर परिक्रमा कराकर चंदन तालाब लाया जाता है।अनुष्ठित होनेवाली शोभायात्रा अलौकिक होती है जिसमें लगातार 21 दिनों तक आगे-आगे परम्परागत बनाटी कौशल प्रदर्शन,तलवार चालन,पाईक नृत्य और भजन-संकीर्तन के मध्य देव प्रतिमाओं को चंदन तालाब लाया जाता है जहां पर पहले से ही गजदंत आकार की नौकाएं एकसाथ जोडकर तथा हंस के आकार की तैयार कर तथा पूरी तरह से सजाकर रखी रहतीं हैं।पूरे 21 दिनों तक देवों को उन नौकाओं में आरुढ कराकर चंदन तालाब के एक छोर से दूसरे छोर तक नौका विहार कराया जाता है। चंदन तालाब के मध्य अवस्थित चंदनघर ले जाकर उन्हें चंदन का लेप लगाकर सुवासित जल से उन्हें पवित्र स्नान कराया जाता है।चंदन तालाब कुल तीन एकड़ में है जिसे बिजली की रोशनी से अति सुंदर तरीके से आलोकित किया जाता है जिसके दिव्य दर्शन के लिए देश-विदेश के हजारों जगन्नाथ भक्त लगभग एक महीने तक पुरी धाम में ही रहते हैं।
अशोक पाण्डेय

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