
अशोक पाण्डेय
2026 की देवस्नान पूर्णिमा आगामी 30जून को है। वह तिथि है -ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि। उस दिन श्रीमंदिर के रत्नवेदी पर अनादिकाल से विराजमान चतुर्धा देवविग्रहों को भोर में पहण्डी विजय कराकर श्रीमंदिर के रत्नवेदी से स्नानमण्डप पर लाया जाता है।चतुर्धा देवविग्रहों को 108 स्वर्ण कलश शीतल जल से महास्नान कराया जाता है।108 स्वर्ण कलश शीतल जल श्रीमंदिर प्रांगण में अवस्थित देवी माता विमला देवी के स्वर्ण कूप से लाया जाता है। 35 स्वर्ण कलश शीतल जल से जगन्नाथ जी को,33 स्वर्ण कलश शीतल जल से बलभद्रजी को,22 स्वर्ण कलश शीतल जल से सुभद्राजी को तथा 18 स्वर्ण कलश शीतल जल से सुदर्शन जी को महास्नान कराया जाता है।महास्नान में चतुर्धा दिवविग्रहों को मलमलकर नहलाया जाता है।महास्नान के उपरांत चतुर्धा देवविग्रहों को गजानन वेष में सुशोभित किया जाता है।श्रीजगन्नाथ पुरी धाम में प्रतिवर्ष देवस्नानपूर्णिमा को भगवान जगन्नाथ के जन्मोत्सव के रुप में ही मनाया जाता है। श्रीमंदिर के सिंह द्वार के समीप ही निर्मित है-देवस्नानमण्ड।इसलिए बड़दाण्ड से ही लाखों श्रद्धालु जगन्नाथ चतुर्धा देवविग्रहों को मलमल कर महास्नान करते हुए अपनी आंखों से देखते हैं और भगवान जगन्नाथ के माधुर्य लीला के दर्शन करते हैं। श्रीमंदिर प्रशासन प्रशासन,पुरी से प्राप्त जानकारी के अनुसार ऐसी मान्यता है कि एक समय देवस्नान पूर्णिमा के दिन महाराष्ट्र से एक गाणपत्य भक्त विनायक भट्ट पुरी धाम आया जिसकी इच्छा हुई कि वह जगन्नाथ जी को उनके जन्मोत्सव के दिन अर्थात् देवस्नान पूर्णिमा के दिन महास्नान के उपरांत उन्हें गजानन वेष में दर्शन करें।ऐसे में भगवान जगन्नाथ तत्काल अपने मुख्य पुजारी को यह दिव्य संदेश दिए कि अपने विनायक भट्ट भक्त की इच्छानुसार महास्नान के उपरांत उन्हें गजानन वेष में सुशोभित किया जाय और उसी समय से प्रतिवर्ष देवस्नान पूर्णिमा के दिन महास्नान के उपरांत चतुर्धा देवविग्रहों को गजानन वेष में सुशोभित किया जाता है। उसके उपरांत भगवान जगन्नाथ जी के प्रथम सेवक पुरी के गजपति महाराजा श्री श्री दिव्य सिंहदेव जी महाराजश्री अपने पुरीधाम राजमहल श्रीनाहर से पालकी में आरुढ़ होकर आते हैं और छेरापंहरा का पवित्र दायित्व निभाते हैं। अत्यधिक स्नान करने के चलते देवविग्रह बीमार प़ड जाते हैं।ऐसे में,उन्हें उनके बीमार कक्ष में लाकर 15 दिनों तक एकांतवास कराया जाता है और उनका वहां पर आयुर्वेदसम्मत इलाज होता है। उन 15 दिनों तक श्रीमंदिर का कपाट बन्द कर दिया जाता है।उस दौरान जो भी जगन्नाथ भक्त पुरी धाम आते हैं वे जगन्नाथजी के दर्शन ब्रह्मगिरि जाकर वहां पर अवस्थित भगवान अलारनाथ के दर्शन के रुप में करते हैं। ब्रह्मगिरि में भगवान अलारनाथ की काले प्रस्तर की भगवान विष्णु की मूर्ति है जो बहुत ही सुंदर है। उस दौरान ब्रह्मगिरि में भगवान अलारनाथ को निवेदित होनेवाला खीर भोग समस्त जगन्नाथ भक्त बडे चाव से भगवान जगन्नाथ के महाप्रसाद के रुप में ग्रहण करते हैं। भारत का अन्यतम धाम पुरी धाम अपने आप में धाम भी है,तीर्थ भी है और श्रेत्र भी है जहां पर देवस्नान पूर्णिमा के दिन भगवान जगन्नाथ के जन्मोत्सव को तथा उनके गजानन वेष में दर्शन का अति विशिष्ट आध्यात्मिक और लौकिक महत्त्व माना जाता है। कहते हैं कि महास्नान के उपरांत लगातार 15 दिनों तक आर्युवेदसम्त इलाज के उपरांत चतुर्धा देवविग्रह पूरी तरह से स्वस्थ होकर आषाढ शुक्ल प्रतिपदा तिथि को अपने भक्तों को अपने नवयौवन वेष में दर्शन देते हैं।गौरतलब है कि 2026 की भगवान जगन्नाथ की विश्वप्रसिद्ध रथयात्रा आगामी 16 जुलाई को है जिसदिन वे रथारुढ होकर अपनी मौसी के घर गुण्डीचा मंदिर जाएंगे।वहां पर वे सात दिनों तक विश्रामकर पुनः बाहुडा यात्रा कर श्रीमंदिर वापस लौट आएंगे।
अशोक पाण्डेय











