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” ज्ञान, कर्म और उपासना में श्रेष्ठतम कौन है ?”

-अनुचिंतन: अशोक पाण्डेय
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“श्रीमद् भागवत महापुराण”, “श्रीमद् भागवत गीता” और “श्रीरामचरितमानस” के अनुसार ज्ञान परमपिता परमेश्वर के अधीन है।ज्ञान ही परमेश्वर है। इसलिए श्रेष्ठतम है ज्ञान है।कर्म मोक्ष का आधार है। ज्ञान और कर्म दोनों का स्थान और महत्त्व एक जैसा ही माना जाना चाहिए। दोनों का संबंध अन्त:करण की शुद्धता से है, आचरण, विचार और लोक व्यवहार की शुद्धता से है। ज्ञान से ही मुक्ति मिलती है ‌। इसलिए नि: स्वार्थ होकर सभी प्रकार की सेवाएं: सद्गुरु सेवा, भगवान जगन्नाथ सेवा, दरिद्र-नारायण सेवा, ब्राह्मण सेवा, गौसेवा और मानवता सेवा ही हमें सच्चे कर्मयोगी बनाते हैं। इसीलिए हमें अपनी व्यक्तिगत कामाग्नि, क्रोधाग्नि, तृष्णाग्नि और ईर्ष्याग्नि से बचाव करना होगा। देवर्षि वसिष्ठ मुनि कहते हैं कि ज्ञान, कर्म, जप, तप,योग और दान हमें परमपिता परमेश्वर की अनन्य भक्ति और मानव जीवन को सार्थक बनाते हैं ।
-अशोक पाण्डेय

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