-अशोक पाण्डेय
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जय जगन्नाथ!
एक बार राधारानी/श्यामा रानी ने अपने ठाकुर जी से निवेदन किया कि वे उनपर रूठें और वे उनको अवश्य मना लेंगी। दोनों के बीच मान-लीला के नियम के अनुसार सूर्यास्त से पहले रूठना छोड़ देना हुआ। श्यामा रानी श्रीश्याम को मनाने के लिए कभी नृत्य करतीं,कभी उन्हें माखन -मिश्री खिलातीं,कभी मधुर गीत गातीं,कभी श्रीश्याम जी को सुगंधित फूलों की माला पहनातीं तो कभी मोर पंख धारण कर नृत्य करतीं।फिर भी, श्रीश्याम माने नहीं। लगातार तीन दिनों तक मान- मनौव्वल चलता रहा। ब्रजधाम श्यामा रानी के वियोग से पूरी तरह से वियोगमग्न हो गया। यहां तक कि यमुना जी भी तप्त हो उठीं।अंत में, श्रीश्याम वास्तविक रूप में नृत्य करते हुए आकर श्रीश्यामा रानी को मना लिये।
मान्यवर,आप सभी रूठे देवी -देवताओं को मनाना भी अच्छी तरह से जानते हैं।
जय हो माता ब्रह्मचारिणी की!
-अशोक पाण्डेय
“ठाकुर जी की मान लीला और श्री श्यामा मां के मनाने की कला”











