– अशोक पाण्डेय
शाश्वत भारतीय संस्कृति तथा संस्कारों का महापर्व दीपावली ही है।इसे दीवाली तथा दीपोत्सव भी कहा जाता है।इसे कार्तिक मास की अमावस्या को प्रतिवर्ष मनाया जाता है।यह महापर्व अंधकार पर प्रकाश की विजय,बुराई पर अच्छाई की विजय,असत्य पर सत्य की विजय,अज्ञानता पर ज्ञान की विजय तथा निराशा पर आशा की विजय का प्रतीक माना जाता है।
ऐसी मान्यता है कि जब मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम 14 वर्षों तक वन में रहकर तथा भारतवर्ष की आदि वनवासी संस्कृति और संस्कार को सुरक्षित करके जब अयोध्या लौटे तो उनके अयोध्या वापस लौटने की खुशी में अयोध्यावासियों ने अपने-अपने घरों में घी के मिट्टी के दीये जलाकर पहली बार दीपावली मनाई थी।
यह महापर्व आपसी भाईचारे,प्रेम,सद्भाव और सहयोग का महापर्व है।गौरतलब है कि मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम चन्द्र लगभग दो अरब वर्षों से इस सृष्टि के शाश्वत पुरुष हैं,भाव पुरुष हैं,मर्यापुरुषोत्तम हैं तथा भुवनेश्वर हैं।उन्होंने लोकमंगल तथा लोकहित के लिए ही नर रुप में अपनी समस्त मर्यादित लीलाएं कीं।वे मानवीय करुणा की आर्द्रता की अभिव्यक्ति के प्रत्यक्षण प्रमाण हैं।वे आज भी प्रत्येक सनातनी के अपने श्रीराम हैं।उनका मर्यादित व्यक्तित्व उनके मर्यादित सत्कर्मों से प्रकट होता है।
इसीलिए दीपावली प्रतिवर्ष हमें उनके आदर्शों पर चलने का संदेश देती है। दीपावली हमें सभी प्रकार की साफ-सफाई,शुद्धता,पवित्रता तथा ज्ञान- आलोक का भी संदेश देती है।
दीपोत्सव हमें नवीनता के साथ अर्थात् नये-नये वस्त्र धारणकर अपने-अपने घरों को दीपमालाओं से आलोकित कर तथा आकाशदीप जलाकर देवों के देव गणेशजी तथा धन की देवी लक्ष्मी आदि की विधिवत पूजा-अर्चन करने का पावन संदेश देता है।
दीपावली मनाने का उद्देश्य यह भी है कि जो मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम भारतवर्ष की आत्मा हैं तथा भारतीय अस्मिता के जीवंत प्रमाण हैं,उनको तथा उनके मर्यादित आदर्शों को आज भी हमसब अपनाएं और भारतवर्ष को विकसित बनाने में पूर्ण सहयोग दें।सच तो यह भी है कि सत्युग से लेकर आजतक श्रीरामचन्द्र ही भारतवर्ष के एकमात्र तपस्वी राजा रहे हैं।वे करुणा के सागर हैं।वे सत्य,न्याय और धर्म के रक्षक हैं।दीपोत्सव मनाते समय मर्यादापुरुषोत्तम के उन्हीं मर्यादित आदर्शों को हमेशा हमसब याद रखें तथा 2026 की दीपावली को पूरी तरह से प्रदूषणमुक्त रुप में ही मनाएं क्योंकि सांस्कृतिक प्रदेश ओड़िशा की देव दीपावली(श्रीमंदिर,पुरी धाम) का भी यही संदेश है।साथ ही साथ इस वर्ष घर-घर में मनाये जानेवाले दीपोत्सव का भी यही संदेश होना चाहिए कि हमसब सनातनी संकल्पित भाव से अपने-अपने मन के अंधकार रुपी ईर्ष्या,घृणा और अज्ञानता को दूरकर सदैव आनंदमय तरीके से इस दीपोत्सव महापर्व को मनाएं।
-अशोक पाण्डेय










