” श्रद्धा और प्रेम क्या है? “-
हिन्दी समीक्षक यह मानते हैं कि श्रद्धा और प्रेम में बहुत अंतर है। जैसे:
“स्वरूप होता जिसका न भव्य है,कार्य होते जिसके मनोज्ञ हैं।”
“अतीव प्यारा बनता सदैव है, मनुष्य सो भी गुण के प्रभाव।” -अयोध्या सिंह उपाध्यक्ष ‘हरिऔध’.
आपके सद्कर्म ऐसे होने चाहिए कि जो कभी भी आपको देखा नहीं , जो कभी आपसे मिला नहीं वह भी आपसे श्रद्धा रखे जबकि आपका स्वभाव इतना सरल और आत्मीय हो जिससे कि सभी आपसे प्रेम करें!
-अशोक पाण्डेय









