आज के लिए एक कथा सुनें!
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एक बार शुकदेव जी ने अपने गुरु विदेह राजा जनक को गुरु -दक्षिणा में कुछ देने की इच्छा प्रकट की। गुरु ने कहा कि शिष्य , तुम्हारे पास जो भी व्यर्थ चीज हो उसे ही मुझे गुरु- दक्षिणा में दे दो। शुकदेव जी स्वचिंतन -मननकर क्रमशः मिट्टी,पत्थर और कूड़े-कचरे के पास जाकर उनसे निवेदन किया कि वे उनके गुरु -दक्षिणा में जाने की अनुमति उन्हें दें! लेकिन सभी ने अपनी- अपनी शाश्वत
उपयोगिताओं को स्मरण दिलाकर गुरु- दक्षिणा में जाने से मना कर दिया। अंत में, शुकदेव जी को अहसास हुआ कि उनका अपना अहंकार ही व्यर्थ है जिसे वे अपने गुरु को गुरु -दक्षिणा में देकर यह सिद्ध कर दिया कि इस दुनिया में सबसे व्यर्थ चीज सिर्फ व्यक्ति का अपना अहंकार ही है।
आपसभी की हमेशा जय-जयकार हो!
-अशोक पाण्डेय











