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आलोकपुरुषः प्रोफेसर अच्युत सामंत

आलोकपुरुषः

प्रोफेसर अच्युत सामंत

खण्डःएक

लेखकः अशोक पाण्डेय

राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त.

ओड़िशा प्रदेश की राजधानी भुवनेश्वर स्थित कीट-कीस और कीम्स जैसी विश्व विख्यात शैक्षणिक संस्थाओं के संस्थापक हैं महान् शिक्षाविद् प्रोफेसर डॉ.अच्युत सामंत। उनकी निःस्वार्थ जनसेवा,लोकसेवा,समाजसेवा,आदिवासी कल्याण सेवा, स्वास्थ्य सेवा,विज्ञान सेवा, मातृभाषा सेवा,राजभाषा ओड़िया सेवा,ओड़िशा कला,साहित्य,संस्कृति,मनोरंजन सेवा,बाल प्रतिभा विकास सेवा,आदिवासी शक्तिकरण सेवा,नारी सशक्कितकरण सेवा, ओड़िशा प्रदेश के सामाजिक-आर्थिक विकास,धार्मिक,आध्यात्मिक और सांस्कृतिक सेवाओं के लिए आज महान् शिक्षाविद् प्रोफेसर डॉ. अच्युत सामंत को  आलोक पुरुष,दिव्यपुरुष,विकास पुरुष,प्रेरणापुरुष,आदिवासी समुदाय के बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए जीवित मसीहा,संतों के संत,भारत के दूसरे वास्तविक मदनमोहन मालवीय,भारत के वास्तविक दूसरे शांतिनिकेतन के जन्मदाता जैसे अनेक रुपों में पूरी दुनिया उन्हें जानती है और उनसे खूब प्यार करती है। वे आज की तारीख में एकमात्र ऐसे निःस्वार्थ कर्मयोगी हैं जिनको देश-विदेश के विभिन्न नामचीन विश्वविद्यालयों से कुल 75 मानद डॉक्टरेट की डिग्री मिल चुकी है जो पूरे भारतवर्ष के लिए एक नवीन कीर्तिमान है।अपनी सादगी, सरलता,मृदुलता,हंसमुख व्यक्तित्व, सत्यनिष्ठा, आत्मविश्वास, कार्यसंस्कृति तथा दूरदर्शिता के बदौलत महान् शिक्षाविद् प्रोफेसर डॉ.अच्युत सामंत  जन-जन के आदर्श बन चुके हैं विशेषकर बालकों,युवाओं, विधिवेत्ताओं, समाजसेवियों, कारपोरेट जगत के भामाशाहों,जेन-जी के युवा नेताओं तथा समाजसेवियों आदि के लिए प्रोफेसर अच्युत सामंत आदर्श हैं।वे ओड़िशा समेत भारतवर्ष को एक कृतज्ञ राष्ट्र बनाने हेतु संकल्पित विदेह जीवन जी रहे हैं।वे हमेशा कहा करते हैं कि समस्त भारतवासी कृतज्ञ बनें,कृतघ्न नहीं।समस्त भारतवासी सकारात्मक सोचवाले बनें,नकारात्मक सोचवाले कदापि नहीं।

आलोक पुरुष का बाल्यकाल

20जनवरी,1965 में ओड़िशा प्रदेश के अविभाजित कटक जिले के कलराबंक नामक गांव में जन्मे प्रोफेसर डॉ.अच्युत सामंत का  बाल्यकाल घोर आर्थिक गरीबी की एक सच्ची गाथा है। उनका पैतृक गांव कलराबंक महानदी की एक सहायक नदी के किनारे बसा है।उन दिनों गांव तक पहुंचने के लिए बहुत ही संकरी सड़क होती थी। गौरतलब है कि जब प्रोफेसर डॉ. अच्युत सामंत मात्र चार साल के शिशु थे तभी उनके पिताश्री अनादिचरण सामंत का एक रेल दुर्घटना में असामयिक निधन हो गया जो आज के झारखण्ड राज्य के जमशेदपुर में काम करते थे।उनकी मां की उम्र उस वक्त मात्र 40 साल की थी। अचानक परिवार के भरण-पोषण का सारा बोझ उनकी मां के ऊपर आ गया। वे अपनी घोर गरीबी,भूखमरी तथा सामाजिक अपमान के बीच अपने सभी बाल-बच्चों को पढ़ा-लिखाकर स्वावलंबी बनाईं।उन दिनों उनके गांव में मुख्य रुप से दुर्गापूजा और काली पूजा होती थी।सामंत जी लिए पूजा के अवसर पर झांझ की ध्वनि तथा सामूहिक नृत्य उनको हर्षोल्लास से भर देता था। उनके गांव कलराबंक में उन दिनों सभी बुनियादी सुविधाएं जैसेःसड़क,बिजली आदि नहीं थीं।

वे अपने बाल्यकाल में  टूटे-फूटे  खपरैलवाले एक घर में रहते थे।बड़ी मुश्किल से जहां उनका गुजारा होता था।दिन तो किसी तरह से कट जाता था लेकिन जैसे ही शाम होती रोशनी के लिए लालटेन के टूटे शीशे के अंदर से आनेवाली रोशनी का ही उन्हें इंतजार रहता था। ऊपर से  बिडंबना यह थी कि लालटेन जलाने के लिए किरासन तेल नहीं होता था। वह डरावनी रात उनके दिल की धड़कनों को और तेज कर देती थी जब तेज हवाएं सांय-सांयकर चलतीं और उसके प्रभाव से पेड़ों के सूखे पत्ते गिरते और उसकी आवाज उन्हें और अधिक डरावनी बना देती थी। तेज हवाएं पेड़ों को तोड़ देती थीं। ऐसा लगता था कि उनके ऊपर ही तो कहीं पेड़ न गिर जाए। दो कमरेवाले खपरैल के मकान की टूटी छत से  बरसा का पानी जब घर के अंदर आता तो घर के सभी सदस्यों को भिंगो देता। उपर से बहनेवाली ठंडी हवाएं कलेजे को चिर देतीं थीं। रातभर जगकर रहना पड़ता था। ऊपर से भूख की पीड़ा से नींद भी नहीं आती थी। कभी-कभी तो उनकी विधवा मां नीलिमारानी सामंत के साहस,धीरज और कठोर परिश्रम से गीला चावल और जंगली पालक खाकर ही उन्हें अपना जीवन यापन करना पड़ता था।ऐसे में उनकी स्वर्गीया मां कहतीं-बेटा, याद रखो जगदीश उद्धारकर्ता है और वह गिरे हुए को हमेशा बचा ही लेता है।सामंतजी की मां ने ही पहली बार उन्हें यह बताया कि भगवान जगन्नाथ ही जगदीश हैं।वे ही सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के भगवान हैं ,जगत के नाथ जगन्नाथ हैं। सामंतजी की मां ने ही उनको सर्वप्रथम भगवान जगन्नाथ के नाम का जाप करना  सिखाया। जब गर्मी का मौसम आया तब सामंत जी को शुकून मिला। वे अब अटूट जगन्नाथ भक्ति को अपना लिये।वे अपने बाल्याकल की घोर गरीबी से यह सीख लिये कि गरीबी हमेशा मानवीय संबंधों को तोड़ देती है। लेकिन सामंत जी के बाल्यकाल की घोर गरीबी ने कालांतर में उनको एक स्वनिर्मित व्यक्ति बना दिया जिसके बदौलत प्रोफेसर डॉ.अच्युत सामंत आज लाखों उपेक्षित तथा विकास से वंचित युवाओं के  रोल मॉडल हैं। लोकाचार क्या है-इसे कोई  आज सही अर्थों में समझना चाहे तो महान् शिक्षाविद् प्रोफेसर डॉ. अच्युत सामंत ने व्यावहारिक रुप में सीखे।

क्रमशः

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