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तीनों रथों का विवरण

-अशोक पाण्डेय

भगवान जगन्नाथजी की विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा के लिए प्रतिवर्ष तीन नये रथों का निर्माण होता है।प्रतिवर्ष अक्षय तृतीया से यह पवित्र कार्य आरंभ होता है।रथ-निर्माण की अत्यंत गौरवशाली सुदीर्घ परम्परा है। इस कार्य को वंशानुगत क्रम से सुनिश्चित बढईगण ही करते हैं। यह कार्य पूर्णतः शास्त्रसम्मत विधि से संपन्न होता है। रथनिर्माण विशेषज्ञों का यह मानना है कि तीनों रथ, बलभद्रजी का रथ तालध्वज रथ,सुभद्राजी का रथ देवदलन रथ तथा भगवान जगन्नाथ के रथ नंदिघोष रथ का निर्माण पूरी तरह से शास्त्रसम्मत तथा वैज्ञानिक तरीके से होता है।
रथ निर्माण के लिए काष्ठ्य संग्रह का पवित्र कार्य प्रतिवर्ष वसंत पंचमी से आरंभ होता है।काष्ठसंग्रह दशपल्ला के जंगलों से प्रायः होता है।रथनिर्माण का कार्य पुरी के गजपति महाराजा श्री दिव्य सिंहदेवजी के राजमहल श्रीनाहर के ठीक सामने रथखल्ला में होता है। रथ रथनिर्माण का कार्य वंशपरम्परानुसार भोई सेवायतगण ही करते हैं। पहले उनको पारिश्रमिक के रुप में जागीर दी जाती थी लेकिन अब जागीर प्रथा समाप्त होने के बाद उन्हें श्रीमंदिर की ओर से पारिश्रमिक दिया जाता है।रथ-निर्माण में कुल लगभग 205 प्रकार के अलग-अलग सेवायतगण सहयोग करते हैं।रथ-निर्माण कार्य में लगभग दो महीने का समय लगता है।
रथों का विवरणः
भगवान बलभद्र जी का रथःतालध्वज रथ
यह रथ बलभद्रजी का रथ है जिसे बहलध्वज भी कहते हैं।यह 44फीट ऊंचा होता है। इसमें 14चक्के लगे होते हैं। इसके निर्माण में कुल 763 काष्ठ खण्डों का प्रयोग होता है। इस रथ पर लगे पताकों को नाम उन्नानी है।इस रथ पर लगे नये परिधान का रंग लाल-हरा होता है।इसके घोडों का नामःतीव्र,घोर,दीर्घाश्रम और स्वर्णनाभ हैं। घोडों का रंग काला होता है। रथ के रस्से का नाम बासुकी होता है।रथ के पार्श्व देव-देवतागण के रुप में गणेश,कार्तिकेय,सर्वमंगला,प्रलंबरी,हलयुध,मृत्युंजय,नतंभरा, मुक्तेश्वर तथा शेषदेव हैं। रथ के सारथि हैं मातली तथा रक्षक हैं-वासुदेव।
देवी सुभद्राजी का रथः देवदलन रथ
यह रथ सुभद्राजी का है जो 43फीट ऊंचा होता है। इसे देवदलन तथा दर्पदलन भी कहा जाता है। इसमें कुल 593 काष्ठ खण्डों का प्रयोग होता है। इसपर लगे नये परिधान का रंग लाल-काला होता है। इसमें 12 चक्के होते हैं। रथ के सारथि का नाम अर्जुन है। रक्षक जयदुर्गा हैं। रथ पर लगे पताके का नाम नदंबिका है। रथ के चार घोडे हैं –रुचिका,मोचिका,जीत तथा अपराजिता हैं। घोडों का रंग भूरा है। रथ में उपयोग में आनेवाले रस्से का नाम स्वर्णचूड है। रथ के पार्श्व देव-देवियां हैःचण्डी, चमुण्डी, उग्रतारा, शुलीदुर्गा,वराही,श्यामकाली,मंगला और विमला हैं।
भगवान जगन्नाथ का रथः नन्दिघोष रथः
यह रथ भगवान जगन्नाथजी का रथ है जिसकी ऊंचाई 45फीट होता है। इसमें 16चक्के होते हैं। इसके निर्माण में कुल 832 काष्ठ खण्डों का प्रयोग होता है। रथ पर लगे नये परिधानों का रंग लाल-पीला होता है। इसपर लगे पताके का नाम त्रैलोक्यमोहिनी है। इसके सारथि दारुक तथा रक्षक हैं –गरुण। इसके चार घोडे हैःशंख,बलाहक,सुश्वेत तथा हरिदाश्व।इस रथ में लगे रस्से का नामः शंखचूड है। रथ के पार्श्व देव-देवियां हैःवराह, गोवर्धन, कृष्ण,गोपीकृष्ण,नरसिंह, राम, नारायण,त्रिविक्रम,हनुमान तथा रुद्र हैं।
-अशोक पाण्डेय

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