नदियां जब समन्दर से मिलती हैं तो मिलने से पहले डरकर बहुत शोर करतीं हैं ,फिर उन्हें अचानक क्या होता है कि वे अपनी समस्त धाराओं को मोड़कर समन्दर से जाकर मिल जाती हैं।
ठीक उसी प्रकार मानव और भक्त भी अपने इष्टदेव से मिलने से पहले अविश्वास में उलझा रहता है लेकिन जैसे ही उसके मन में अपने इष्टदेव के प्रति अटूट विश्वास जग जाता है,वह श्रीमंदिर से लेकर इस सृष्टि के कण- कण में भगवान जगन्नाथ के दर्शन करता है और आजीवन
आत्मसंतोष के साथ –
“जय जगन्नाथ” कहता है।
-अशोक पाण्डेय









