-अशोक पाण्डेय
2026 की भगवान जगन्नाथ की बाहुड़ा यात्रा आगामी 24 जुलाई को है।चतुर्धा देवविग्रह गुण्डीचा मंदिर में गुण्डीचा महोत्सव मनाकर तथा सात दिनों तक विश्रामकर लक्ष्मी-नारायण रुप में रथारुढ़ होकर बाहुड़ा विजय करेंगे।वे पुनः अपने जन्मवेदी(गुण्डीचा)से श्रीमंदिर के रत्नवेदी पर वापस लौटेंगे।उस दिन सुबह गुण्डीचा मंदिर में चतुर्धा देवविग्रहों की सुबह में मंगल आरती होगी,मयलम,तडपलागी और रोसडा भोग होगा।अवकाश,सूर्यपूजा,द्वारपाल पूजा,शेषवेश आदि विधि-विधान संपन्न होगा।चतुर्धा देवविग्रहों को गोपालवल्लव भोग(खिचडी भोग) निवेदित कराकर एक-एककर पहण्डी विजय कराकर उनके सुनिश्चित रथों पर आरुढ़ किया जाएगा।भगवान जगन्नाथ के प्रथम सेवक पुरी के गजपति महाराजा श्री श्री दिव्य सिंहदेवजी महाराजा अपने राजमहल श्रीनाहर से पालकी में पधारकर तीनों रथों पर चंदनमिश्रित पवित्र जल छिडककर छेरापंहरा करेंगे।उसके उपरांत तीनों रथों पर लगीं नारियल की सीढियों को हटा दिया जाएगा तथा रथों को उनके घोड़ों से जोड़ दिया जाएगा।तीनों रथ क्रमशः तालध्वज, देवदलन तथा नंदिघोष को समस्त जगन्नाथ भक्तगण जय जगन्नाथ तथा हरिबोल के जयघोष के साथ खींचकर श्रीमंदिर के सिंहद्वार के समीप लाएंगे।आगामी 25 जुलाई को रथ पर ही चतुर्धा देवविग्रहों का सोना वेष होगा जिसमें श्रीमंदिर के रत्नभण्डार से कुल बारह हजार तोले के सोने के अनेक आभूषण,हीरे-जवाहरात आदि से चतुर्धा देवविग्रहों को नख से लेकर मस्तक तक सुशोभित किया जाएगा।वह अभूतपूर्व रुप भगवान जगन्नाथ की ऐश्वर्य लीला का प्रत्यक्ष प्रमाण होता है।अगले दिन अर्थात् 26 जुलाई को चतुर्धा देवविग्रहों का अधरपडा होता है। आगामी 27 जुलाई को नीलाद्रि विजय कर भगवान जगन्नाथ अपने रत्नवेदी पर पुनः आरुढ़ होकर अपने भक्तों को दर्शन देंगे।
–अशोक पाण्डेय










