रक्षाबंधन की हार्दिक शुभकामनाएं!
श्रीमद्भागवत महापुराण के अष्टम स्कन्ध के अनुसार: एक बार भगवान श्रीहरि विष्णु ने वामन अवतार धारण कर महादानी दैत्यराज बलि से तीन पग भूमि दान में मांग लिया था। नारायण ने अपने मात्र दो पगों में सम्पूर्ण सृष्टि माप ली थी। जैसे ही वे अपना तीसरा पग के लिए तैयार हुए तो दैत्यराज महादानी राजा बलि ने अपना मस्तक उनके आगे कर दिया। महादानी राजा बलि की दानशीलता और भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें वर मांगने के लिए कहा। दैत्यराज महादानी बलि ने नारायण से प्रार्थना की कि नारायण जी सदा उनके पाताल लोक स्थित राजमहल में निवास करें! नारायण ने महादानी बलि के आग्रह को सहर्ष स्वीकार कर पाताल लोक चले गये। इधर माता लक्ष्मी व्याकुल हो गईं। देवर्षि नारद के परामर्श से वे एक निर्धन स्त्री का वेश धारण कर पाताल लोक पहुँचीं। वहीं पर आज के ही दिन अर्थात् श्रावण पूर्णिमा के दिन उन्होंने राजा बलि को राखी बाँधकर उनको अपना भाई बना लिया।
उपहार स्वरूप लक्ष्मी ने अपना वास्तविक स्वरूप प्रकट किया और भगवान विष्णु को वैकुण्ठ लौटने की अनुमति मांग ली। राजा बलि ने धर्म का पालन करते हुए सहर्ष भगवान को वापस बैकुंठ लोक विदा कर दिया।
रक्षाबंधन का मंत्र है:
“येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः।
*तेन त्वामभिबध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥”
अर्थात् जिस रक्षासूत्र से परम प्रतापी दानवेन्द्र राजा बलि बाँधे गए थे, उसी रक्षासूत्र से मैं तुम्हें बाँधती हूँ। हे रक्षासूत्र! तुम अपने धर्म तथा रक्षा के संकल्प से कभी विचलित मत होना।”
संकलन: अशोक पाण्डेय











