






विश्व का एकमात्र संस्कृति संपन्न देश भारत है जहां के आध्यात्मिक प्रदेश ओडिशा के श्रीजगन्नाथ धाम पुरी में अनादिकाल से विराजमान हैं जगत के नाथ भगवान जगन्नाथ। वे श्रीमंदिर के रत्नवेदी पर चतुर्धा देवविग्रह रुप में विराजमान हैं। वे कलियुग के एकमात्र पूर्ण दारुब्रह्म हैं जो अपने दर्शन मात्र से भक्तों को विश्व को शांति,एकता और मैत्री का पावन संदेश देते हैं।
प्रतिवर्ष आषाढ शुक्ल द्वितीया को भगवान जगन्नाथ की विश्वप्रसिद्ध रथयात्रा अनुष्ठित होती है जो अपने आपमें एक सांस्कृतिक महोत्सव होता है।2026 की रथयात्रा आगामी 16 जुलाई को है।
भगवान जगन्नाथजी की विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा के लिए प्रतिवर्ष तीन नये रथों का निर्माण होता है। श्रीमंदिर के समस्त रीति-नीति के तहत वैशाख मास की अक्षय तृतीया से रथनिर्माण का कार्य आरंभ होता है।रथ-निर्माण में कुल लगभग 45 दिन लगते हैं।काष्ठ संग्रह का कार्य बसंतपंचमी से आरंभ होता है।
रथ-निर्माण की अत्यंत गौरवशाली और सुदीर्घ परम्परा रही है। इस कार्य को वंशानुगत क्रम से सुनिश्चित सेवायत बढईगण ही करते हैं। यह कार्य पूर्णतः शास्त्रसम्मत विधि से संपन्न होता है। तीनों रथ, बलभद्रजी का रथ तालध्वज रथ,सुभद्राजी का रथ देवदलन रथ तथा भगवान जगन्नाथ के रथ नंदिघोष रथ का निर्माण पूरी तरह से वैज्ञानिक तरीके से होता है। रथ-निर्माण में कुल लगभग 205 प्रकार के अलग-अलग सेवायतगण सहयोग करते हैं। रथ निर्माण के क्रम में ऐसी मान्यता है कि जिस प्रकार पंचतत्वों से मानव-शरीर का निर्माण हुआ है, ठीक उसी प्रकार काष्ठ,धातु,रंग,परिधान तथा सजावटी वस्तु, पंच सामग्रियों से रथों का पूर्णरुपेण निर्माण होता है। पौराणिक मान्यता के आधार पर रथ ही मानव-शरीर होता है ,रथि मानव-आत्मा,सारथि-मानव-बुद्धि,लगाम मानव-मन तथा रथ के घोडे मानव-इन्द्रीयगण के प्रतीक हैं। जगन्नाथ जी की विश्वप्रसिद्ध रथयात्रा के दिन तीनों ही रथ चलते-फिरते मंदिर होते हैं।
रथों का विवरणः
तालध्वज रथः
भगवान जगन्नाथ जी के बड़े भाई बलभद्रजी के रथ का नाम तालध्वज है। इसे बहलध्वज भी कहते हैं।इसे ताल जंगव के देवताओं ने बलभद्रजी को भेंट किया था। यह 44फीट ऊंचा होता है जिसमें 14चक्के लगे होते हैं। इसके निर्माण में कुल 763 काष्ठ खण्डों का प्रयोग होता है। इस रथ पर लगे पताके का नाम उन्नानी है। इस रथ पर लगे नये परिधान के रंग लाल-हरा होता है। इसके घोडों का नामःतीव्र,घोर,दीर्घाश्रम और स्वर्णनाभ हैं। घोडों का रंग काला होता है। रथ के रस्से का नाम बासुकी होता है।रथ के पार्श्व देव-देवतागण के रुप में गणेश, कार्तिकेय,सर्वमंगला,प्रलंबरी,हलयुध,मृत्युंजय,नतंभरा, मुक्तेश्वर तथा शेषदेव हैं। रथ के सारथि का नाम मातली है तथा रथ के रक्षक हैं-वासुदेव।
देवदलन रथ
यह रथ भगवान जगन्नाथ की लाड़ली बहन सुभद्राजी का है जिसं देवदलन तथा दर्पदलन भी कहा जाता है। यह 43फीट ऊंचा होता है।इसमें कुल 593 काष्ठ खण्डों का प्रयोग होता है। इसपर लगे नये परिधान का रंग लाल-काला होता है। इसमें 12 चक्के लगे होते हैं। रथ के सारथि का नाम अर्जुन है। रक्षक जयदुर्गा हैं। रथ पर लगे पताके का नाम नदंबिका है। रथ के चार घोडे हैं –रुचिका,मोचिका,जीत तथा अपराजिता हैं। घोडों का रंग भूरा है। रथ में उपयोग में आनेवाले रस्से का नाम स्वर्णचूड़ है। रथ के पार्श्व देव-देवियां हैःचण्डी, चमुण्डी, उग्रतारा, शुलीदुर्गा, वराही, श्यामकाली,मंगला और विमला हैं।
नन्दिघोष रथ
भगवान जगन्नाथजी के रथ का नाम नंदिघोष रथ है। इसे गरुड़धव्ज तथा कपिध्वज भी कहते हैं।इसे स्वयं देवराज इन्द्र ने भगवान जगन्नाथ को प्रदान किया था। रथ की ऊंचाई 45फीट होता है। इसमें 16चक्के होते हैं। इसके निर्माण में कुल 832 काष्ठ खण्डों का प्रयोग होता है। रथ पर लगे नये परिधानों का रंग लाल-पीला होता है। इसपर लगे पताके का नाम त्रैलोक्यमोहिनी है। इसके सारथि दारुक तथा रक्षक हैं –गरुण। इसके चार घोडे हैःशंख,बलाहक,सुश्वेत तथा हरिदाश्व।इस रथ में लगे रस्से का नामः शंखचूड है। रथ के पार्श्व देव-देवियां हैःवराह, गोवर्धन, कृष्ण,गोपीकृष्ण,नरसिंह, राम, नारायण,त्रिविक्रम,हनुमान तथा रुद्र हैं।
-अशोक पाण्डेय










