जानिए आज मुझसे
—————-
द्वापर की एक बड़ी रोचक घटना है। शरद पूर्णिमा के शुक्ल पक्ष की मध्यरात्रि थी। चन्द्र की शीतल और दिव्य आलोकित चंचल किरणें वृंदावन में आनंदमय क्रीड़ा कर रही थीं। रसिक शिरोमणि श्रीकृष्ण को राधारानी संग साथ में समस्त गोपियों के संग दिव्य महारास रचाने का अचानक ध्यान आ गया। बस, उन्होंने अपनी सबसे अच्छी मंदाकिनी बांसुरी बजानी शुरू कर दी। उस मध्य रात्रि में देखते ही देखते समस्त गोपियां उस बांसुरी के स्वर को सुनकर अपने -अपने घर से निकलकर उस कदंब के पेड़ के नीचे आ गईं जहां पर रसिक शिरोमणि श्रीकृष्ण बांसुरी बजा रहे थे। सभी को ऐसी दिव्य अनुभूति हुई कि श्रीकृष्ण सिर्फ उनके साथ ही नृत्य कर रहे हैं। उसी समय सुंदरता के देवता कामदेव भी आ गये। गोपियों के सभी पति भी वहां आ गये जिनको छोड़कर सभीकी पत्नियां वहां आ गईं थीं।राधारानी भी अपने श्रीकृष्ण के संग दिव्य महारास रचाया। रसिक शिरोमणि श्रीकृष्ण ने वहां पधारे कामदेव से कहा कि तुम भी अपने काम का बाण मुझ पर चलाकर अपनी इच्छा पूर्ण कर लो। कामदेव ने कुल पांच काम के बाण चलाए। लेकिन जब श्रीकृष्ण पर उसका कोई असर नहीं पड़ा तो कामदेव ने ही श्रीकृष्ण को “अच्युतानंद” नाम दिया।
-अशोक पाण्डेय
रसिक शिरोमणि श्रीकृष्ण भगवान का नाम “अच्युतानंद”किसने दिया ?











