भगवान अलारनाथ मंदिर,ब्रह्मगिरि,ओड़िशा
अशोक पाण्डेय
ओड़िशा प्रदेश पौराणिक काल से एक आध्यात्मिक प्रदेश रहा है।यहां के पुरुषोत्तम धाम में जगत के नाथ भगवान जगन्नाथ श्रीमंदिर के अपने रत्नवेदी पर चतुर्धा देवविग्रह के रुप में पुरुषोत्तम देव के रुप में पूजे जाते हैं।वे ओड़िया संस्कृति के प्राण हैं।प्रतिवर्ष भगवान पुरुषोत्तम अपनी मानवीय लीला के तहत अपने जन्मोत्सव,ज्येष्ठ देवस्नानपूर्णिमा के दिन महास्नान कर जब बीमार पड़ जाते हैं तब उनके दर्शन श्रीमंदिर में बन्द हो जाता है।ऐसे में,पुरी धाम आनेवाले समस्त जगन्नाथ भक्तों के लिए अगले 15 दिनों के लिए पुरी से लगभग 23 किलोमीटर की दूरी पर ब्रह्मगिरि में अवस्थित भगवान अलारनाथ मंदिर उनके आकर्षण का केन्द्र बन जाता है क्योंकि भगवान जगन्नाथ वहां पर भगवान अलारनाथ के रुप में अपने भक्तों को दर्शन देते हैं।
वैष्णव मतानुसार भगवान अलारनाथ मंदिर का निर्माण स्वयं ब्रह्माजी ने सतयुग में किया।वे यहां पर अपनी तपोस्थली में तपस्या किया करते थे। इस मंदिर में चार भुजाधारी भगवान अलारनाथ जी की काले पत्थर की सुंदर मूर्ति है जो साढे पांच फीट की है। कालांतर में इस मंदिर का निर्माण नवीं सदी में राजा चतुर्थ भानुदेव ने किया जबकि इस मंदिर का पूर्णरुपेण विकास 14वीं सदी में हुआ।ब्रह्मगिरि के अधिसंख्यक स्थानीय निवासी वैष्णव हैं जो प्रतिदिन मंदिर में जाकर भगवान अलारनाथ की पूजा-अर्चना करते हैं।1510 ई. में महाप्रभु चैतन्यदेवजी स्वयं यहां आकर भगवान अलारनाथ के दर्शन किये थे। मंदिर का आध्यात्मिक परिवेश अति मोहक है। 2015 से (भगवान जगन्नाथ के नवकलेवर वर्ष से) मंदिर प्रशासन की पूरी जिम्मेदारी ओड़िशा प्रदेश सरकार ने अपने हाथों में ले ली है।प्रकृति के सुरम्य परिवेश में अवस्थित ब्रह्मगिरि पर्वतमालाएं और प्राकृतिक परिवेश आजकल सैलानियों का स्वर्ग है।
मंदिर में प्रतिदिन भगवान अलारनाथ को खीर का भोग निवेदित किया जाता है।यह भोग महाप्रसाद की तरह ही काफी स्वादिष्ट होता है।ओड़िशा प्रदेश के अधिकांश बड़े-बुजुर्ग भी जगन्नाथ भक्त अणसर(चतुर्धा देवविग्रहों के बीमार के समय) कम से कम एकबार ब्रह्मगिरि जाकर भगवान अलारनाथ के दर्शन अवश्य करते हैं।
अशोक पाण्डेय










