-अशोक पाण्डेय
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वैसे तो धर्माचरण करने वालों को ही भगवान की सच्ची भक्ति प्राप्त होती है।फिर भी,धर्म के चार चरण हैं: सत्य,तप, पवित्रता और दान। भगवान के भक्त भी तीन प्रकार के होते हैं: एक भक्त भगवान की कथा सुनता है। दूसरा भगवान की कथा सुनकर उनकी ओर चलने लगता है और तीसरा जिसकी ओर स्वयं भगवान चलने लगते हैं। भीष्म पितामह ऐसे भक्त थे जिनके पास स्वयं भगवान आ गये थे। मित्रों, भागवत का अर्थ ही है-भगवान की ओर। अमर सद्ग्रंथ महाभारत की कथा ,वाल्मीकि रामायण और श्रीरामचरितमानस की कथा के अनुसार भक्त को गुणवान, सत्यनिष्ठ,उसका रूप, स्वभाव भी सुंदर होना चाहिए,उसके मन में करुणा होनी चाहिए,वह कृतज्ञ होना चाहिए,आत्मवान होना चाहिए और उसे अपने क्रोध पर विजय प्राप्त कर लेना चाहिए। महाभारत में वर्णित कथा के अनुसार पांचों पाण्डव, कुंती, विदुर और द्रौपदी जैसे अनेक पात्र ऐसे ही थे। ऐसे में उनके एकसाथ महाप्रयाण की कथा सुनने योग्य है। सबसे पहले स्व इच्छा से युधिष्ठिर ने प्राण त्याग किया। उसके बाद अर्जुन, उसके उपरांत भीम , उसके बाद नकुल, नकुल के बाद सहदेव । उसके बाद कुंती।इन सभी को देखकर विदुर ने भी अपना प्राण त्याग कर दिया।और अंत में द्रौपदी ने भी अपने प्राण त्याग किया।
कलियुग में उपर्युक्त सभी के महाप्रयाण की कथा को जो भक्त श्रद्धापूर्वक सुनता है उसको भगवान की सच्ची भक्ति प्राप्त होती है।
-अशोक पाण्डेय








