-अशोक पाण्डेय
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सूरदास और तुलसीदास सगुणमार्गी भक्त कवि थे। सूरदास के आराध्य श्रीकृष्ण थे तो तुलसीदास के आराध्य मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम थे। एकदिन सूरदास जी और तुलसीदास जी अपने अपने इष्टदेवों की कृपा की बखान करते हुए घने जंगल से गुजर रहे थे तभी हाथी आ गया। तुलसीदास जी ने सूरदास जी से कहा कि वे अपने इष्ट देव श्रीकृष्ण को रक्षा के लिए पुकारें। सूरदास जी ने पुकार लगाई और श्रीकृष्ण भगवान प्रगट होकर दोनों की रक्षा कर दिए। दोनों और आगे बढ़े। आगे एक शेर आ गया। अब सूरदास जी ने तुलसीदास जी से कहा कि वे अपने इष्ट देव मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम को रक्षा के लिए पुकारें। तुलसीदास जी ने अपने इष्ट देव श्रीराम को पुकारा पर श्रीराम तत्काल प्रगट नहीं हुए। वे कुछ देर बाद आए और शेर से दोनों की रक्षा किए।अब दोनों वार्तालाप करने लगे कि श्रीकृष्ण अच्छे हैं जो तत्काल आ गये वहीं तुलसीदास जी ने कहा कि उनके इष्ट देव करुणानिधान हैं। वे अवश्य ही किसी की करुण पुकार सुनकर उसकी सहायता कर रहे होंगे इसीलिए वे थोड़ा विलम्ब से आये। सूरदास जी और तुलसीदास जी दोनों आत्मीयता के साथ मुस्कराते हुए गले लग गये।
-अशोक पाण्डेय








