डॉ. अच्युत सामंत
एक प्रश्न है जिसने सदियों से दार्शनिकों, संतों और वैज्ञानिकों को समान रूप से सोचने पर मजबूर किया है। प्रश्न इतना सरल है कि कोई बच्चा भी पूछ सकता है—आख़िर देने से अच्छा क्यों लगता है? यह अच्छा लगना वैसा नहीं है जैसा कुछ पाने पर होता है। पाने का सुख क्षणिक होता है—वस्तु मिलते ही उसका आकर्षण धीरे-धीरे कम होने लगता है। लेकिन देने से जो अनुभूति होती है, वह बिल्कुल अलग होती है। वह एक शांत, स्थायी और गहरी ऊष्मा होती है, जो लंबे समय तक मन में बनी रहती है। ऐसा संतोष जो बदले में कुछ नहीं मांगता, और आश्चर्य यह कि जो हमें खाली नहीं बल्कि और अधिक पूर्ण बना देता है। हर सभ्यता ने इस प्रश्न का उत्तर खोजने की कोशिश की है, और लगभग हर सभ्यता एक ही निष्कर्ष पर पहुँची है। भागवत गीता इसे निष्काम कर्म कहती है—फल की इच्छा के बिना कर्म करना। दो, और फिर उसे छोड़ दो। इस अपेक्षा से मत दो कि बदले में कुछ मिलेगा या लोग तुम्हें देखेंगे और सराहेंगे। दो, क्योंकि देना उस आत्मा का स्वाभाविक गुण है जिसने ब्रह्मांड में अपना स्थान समझ लिया है। श्रीकृष्ण कहते हैं—फल तुम्हारा अधिकार नहीं, कर्म तुम्हारा अधिकार है। और देने का कर्म अपने आप में पूर्ण है। गौतम बुद्ध ने तो उदारता यानी दान को ध्यान, अनुशासन और ज्ञान से भी पहले रखा। क्योंकि जो हाथ केवल संग्रह करना जानते हैं, वे ध्यान नहीं कर सकते। जो हृदय हर चीज़ से चिपका रहता है, वह कभी शांत नहीं हो सकता। उदारता कोई ऐसा गुण नहीं जो ज्ञान प्राप्ति के बाद आता हो; वह तो वह द्वार है जिससे ज्ञान भीतर प्रवेश करता है। कुरान में सदक़ा को केवल दान नहीं बल्कि आत्मशुद्धि कहा गया है। जो तुम देते हो वह पवित्र नहीं होता, बल्कि उसे छोड़कर तुम स्वयं अधिक निर्मल हो जाते हो। यहूदी परंपरा में त्ज़ेदकाह दया नहीं बल्कि न्याय है। साझा करना कोई विशेष उदारता नहीं; यह उस संतुलन की पुनर्स्थापना है जिसे संग्रह करने की प्रवृत्ति ने बिगाड़ दिया है। और अब, इन शिक्षाओं के लगभग ढाई हजार वर्ष बाद, आधुनिक विज्ञान भी उसी निष्कर्ष तक पहुँच गया है। अमेरिका के नेशनल इंस्टीट्यूट्स ऑफ हेल्थ के शोध बताते हैं कि जब कोई व्यक्ति दूसरों को कुछ देता है, तो मस्तिष्क का वही भाग सक्रिय हो जाता है जो भोजन, संगीत या प्रिय व्यक्ति के चेहरे को देखकर सक्रिय होता है। शरीर में ऑक्सीटोसिन और एंडोर्फिन जैसे रसायन बढ़ते हैं, जबकि तनाव का हार्मोन कॉर्टिसोल घटता है। अर्थात् देने वाला व्यक्ति केवल मानसिक रूप से नहीं, बल्कि शारीरिक रूप से भी अधिक स्वस्थ होता है। मार्टिन सेलिंगमैन ने अपने शोध में पाया कि उदारता मानव जीवन की स्थायी प्रसन्नता का सबसे विश्वसनीय आधार है। प्राचीन लोग यह सब बिना प्रयोगशालाओं के जानते थे। उन्होंने जीवन को देखा और समझा। उन्होंने उस किसान को देखा जो अपना अनाज बाँटता था और पाया कि उसके खेत कभी सूखे नहीं। उन्होंने उस माँ को देखा जो पूरे मोहल्ले के बच्चों को खिलाती थी और पाया कि उसके अपने बच्चे कभी भूखे नहीं रहे। उन्होंने उस साधु को देखा जिसके पास कुछ नहीं था, फिर भी उसे किसी चीज़ की कमी नहीं थी। और उन्होंने निष्कर्ष निकाला—साझा करने से कुछ घटता नहीं, बल्कि बढ़ता है। मैंने यह शिक्षा न शास्त्रों से सीखी, न विज्ञान से। मैंने इसे एक कप चाय से सीखा। कलराबंक गाँव में मेरा बचपन अत्यंत गरीबी में बीता। चार वर्ष की आयु में पिता का निधन हो गया। माँ ने सात बच्चों को पाला। कई दिन ऐसे होते थे जब खाने को भी कुछ नहीं होता था। पाँच वर्ष की आयु से मैंने छोटे-मोटे काम करने शुरू किए। जो कुछ कमाता, उसे दोस्तों के साथ बाँट देता—चाय, नाश्ता, कभी फिल्म का टिकट। तब मुझे निष्काम कर्म शब्द नहीं पता था। मैंने गीता नहीं पढ़ी थी। पर एक बच्चे की सहज समझ से इतना जानता था कि बाँटने से चाय का स्वाद बेहतर हो जाता है, साथ चलने से रास्ता हल्का लगता है, और गरीबी भी कम भारी प्रतीत होती है। वही भावना आगे चलकर कीट बनी—पाँच हजार रुपये और दो किराए के कमरों से शुरू हुआ एक विश्वविद्यालय। वही भावना कीस बनी—अस्सी हजार आदिवासी बच्चों का घर और विद्यालय। और 2013 में वही भावना Art of Giving बन गई। Art of Giving कोई संगठन नहीं, बल्कि एक अनुभूति है। यह समझ कि देने की इच्छा हर मनुष्य के भीतर पहले से मौजूद है। वह उस दादी में है जो सुबह पक्षियों को दाना खिलाती है। उस ऑटो चालक में है जो बुज़ुर्ग यात्री से किराया नहीं लेता। उस छात्र में है जो अपने कमजोर सहपाठी को पढ़ाने के लिए रुक जाता है। यह भावना हर जगह है; उसे केवल अभिव्यक्ति की अनुमति चाहिए। आज, तेरह वर्षों बाद, Art of Giving को दुनिया के 220 देशों में दो करोड़ से अधिक लोग मनाते हैं। वर्ष 2026 को संयुक्त राष्ट्र ने सस्टेनेबल डेवलपमेंट के लिए स्वयंसेवा का अंतर्राष्ट्रीय वर्ष घोषित किया है, और Art of Giving को इस अभियान में सहयोगी बनने का गौरव प्राप्त हुआ है। इस वर्ष का विषय है—“Share to Shine”। इसका अर्थ केवल धन देना नहीं है। इसका अर्थ है—जो तुम हो, उसे साझा करना। अपना समय, अपना ज्ञान, अपनी शांति, अपना ध्यान, अपनी उपस्थिति। किसी ऐसे व्यक्ति के साथ जो शायद चुपचाप उसकी प्रतीक्षा कर रहा हो। उपनिषदों की एक पंक्ति मुझे वर्षों से प्रेरित करती रही है— “पूर्णमदः पूर्णमिदम्।” वह पूर्ण है, यह पूर्ण है। पूर्ण में से पूर्ण निकाल लेने पर भी पूर्ण ही शेष रहता है। साझा करने का इससे सुंदर वर्णन शायद कभी नहीं लिखा गया। जब आप पूर्णता से देते हैं, तब कुछ कम नहीं होता। दीपक दूसरे दीपक को जलाता है, पर उसकी लौ कम नहीं होती। कमरा केवल अधिक प्रकाशमय हो जाता है। यह केवल दर्शन नहीं है। यह विज्ञान है। यह जीवविज्ञान है। और यह हर उस मनुष्य का अनुभव है जिसने बिना गिने, बिना अपेक्षा के कुछ दिया और आश्चर्य से पाया कि उसके पास पहले से अधिक बचा है।
Share to Shine.
साझा करने का विज्ञान










