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*”भारत” की छाती पर “इंडिया” को बैठाना ही हमारा दुर्भाग्य है*

दिनांक : 05/09/2026
अशोक पाण्डेय:
*”भारत” की छाती पर “इंडिया” को बैठाना ही हमारा दुर्भाग्य है*
*- दीदी माँ साध्वी ऋतम्भरा*
श्री जगन्नाथ धाम, पुरी के होटल सेवन हिल्स में परमशक्ति पीठ द्वारा आयोजित ‘श्रीमद भागवत कथा महोत्सव’ के पाँचवें दिवस पर कथाव्यास पद्म भूषण विभूषिता वात्सल्यमूर्ति पूज्या दीदी माँ साध्वी ऋतम्भरा जी के पावन सानिध्य में आज के मुख्य यजमानगण कांकरोली (राजस्थान) निवासी श्री पवन शर्मा, उनकी धर्मपत्नी श्रीमती सरोज शर्मा एवं नोएडा निवासी श्री  राजेश खंडेलवाल तथा उनकी धर्मपत्नी श्रीमती खंडेलवाल द्वारा व्यासपीठ के पूजन-अर्चन के साथ कथा महोत्सव का शुभारम्भ हुआ।
*मुख्य अतिथि के रूप में भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता और लोकसभा सदस्य श्री संबित पात्रा ने कथा में सम्मिलित होकर पूज्या दीदी माँ जी का आशीर्वाद प्राप्त किया। अपने बहुत ही भावपूर्ण सम्बोधन में आपने कहा कि* -“यह मेरे लिए सौभाग्य का विषय है कि मैं उसी मंच पर खड़ा हूं जिस मंच पर दीदी मां विराजमान हैं। जब हम युवावस्था में थे  उस समय भी श्रीराम जन्मभूमि अयोध्या के आंदोलन को लेकर जिनकी आवाज से जन-जन आंदोलित हुआ,  एक ऐतिहासिक आंदोलन समग्र भारतवर्ष में आरंभ हुआ और आज अयोध्या में श्री रामलला का एक भव्य खड़ा है। उसके पीछे की ऊर्जावान मां दुर्गा की शक्ति के साथ आज मैं मंच साझा कर रहा हूं,  इसलिए मैं बहुत भाग्यशाली हूं। इस समग्र ब्रह्मांड में वाणी ही ब्रह्म है, शब्द ही ब्रह्म है। और शब्द ब्रह्म क्या होता है? यह दीदी मां ने समग्र भारतवर्ष को दिखाया है।
जगन्नाथ पुरी  शक्तिपीठ भी है और यह नारायण धाम भी है। पूरे भारत में इस प्रकार का संयोग  कहीं और नहीं है, जहां शक्तिपीठ में नारायण निवास करते हो। मां विमलेश्वरी जगन्नाथ मंदिर की अधिष्ठात्री देवी है और उनके मंदिर में विराजित हैं महाविष्णु। अद्भुत कला है। आप देखिए कितनी अद्भुत बात है समग्र भारतवर्ष में जब हम नवरात्रि मनाते हैं तो मां के साथ भैरव का वास होता है। भैरव उनके साथ पूजा पाते हैं। यह एकमात्र ऐसा धाम है जहां मां के साथ जब षोडश पूजा होता है उसमें जगन्नाथ भैरव का रूप धारण करते हैं। यह एकात्मवाद ब्रह्मा, विष्णु, महेश कोई दो नहीं है। यह सब एक है।
मैं देखता हूं कि दीदी मां अपने प्रवचन में भागवत कथाओं से वर्तमान की प्रासंगिकता को भी जोड़ती हैं।  जिस प्रकार का विमर्श समाज में है, क्या वह विमर्श सही है या उस विमर्श में किस प्रकार के चिंतन के साथ समाज को आगे बढ़ना चाहिए, उसका दिग्दर्शन दीदी मां देती है। किस प्रकार सनातन बटे नहीं जातियों में किस प्रकार सनातन एक रहे,  इसकी पुरोधा दीदी मां है। ऐसे संत जो एक सूत्र में जाति विहीन सनातन की कल्पना को आगे बढ़ाते हुए, सनातन को सुरक्षित रखने के लिए अपने जीवन का तिल-तिल जला रहे हैं। अपने जीवन का पल-पल वह यहां दे रहे हैं।
मैं आज महाप्रभु जगन्नाथ के श्री चरणों में  प्रार्थना करता हूँ कि हे महाप्रभु, आप अपने दोनों हाथ हमारी दीदी मां के शीश पर रख दीजिए। आप सबसे कहना चाहता हूँ कि हम सबको  दीदी मां की उंगली को पकड़कर, एक होकर सनातन की रक्षा के लिए खड़े होना है। बहुत बड़ी शक्ति के साथ, मां दुर्गा की शक्ति के साथ, मां वैष्णवी के शक्ति के साथ हमें आगे बढ़ना है और उसके लिए आज मां भारती अर्थात माता सरस्वती की पुत्री हमारे बीच में है। मैं पुनः उनका अभिनंदन करता हूं। क्षमाप्रार्थी भी हूं कि पहले जिनसे होना चाहिए संगठन के काम के कारण आज आ रहा हूं और आपके चरणों में अपना सेवा अर्पण कर रहा हूं। जय जगन्नाथ।”
विशिष्ट अतिथियों के रूप में श्री मनसुख सेठिया (राष्ट्रीय सह संयोजक – कुटुम्ब प्रबोधन) एवं श्री लालचंद मेहता (संरक्षक – माहेश्वरी समाज) ने व्यासपीठ पर पूज्या दीदी माँ जी का स्वागत कर उनका आशीर्वाद प्राप्त किया। कथा के सह संयोजक श्री उमेश खंडेलवाल ने भी सपरिवार संग धर्म पत्नी नीलम, एवं मांता जी श्रीमती उर्मिला खण्डेलवाल जी बहन नम्रता,भाई अवधेश और बेटा उमंग चाचा जी श्री अमृत जी एव चाची श्रीमती सरिता जी पूज्य दीदी माँ जी के श्रीचरणों में नमन कर उनसे आशीर्वाद प्राप्त किया | श्री लालचंद मोहताजी, राष्ट्रीय संरक्षक माहेश्वरी समाज, ने भी दीदी माँ का आशीर्वाद प्राप्त किया।
श्री सुभाष जग्गा, श्री संजय भैयाजी, सुश्री स्वास्तिका जी, सुश्री सुमन परमानन्द, सुश्री सीता  परमानन्द, सुश्री साधिका परमानन्द, सुश्री उमा परमानन्द, सुश्री साथी परमानन्द, सुश्री प्रीति  परमानन्द, सुश्री समर्पिता  परमानन्द, सुश्री ज्योति  परमानन्द, सुश्री शास्वती  परमानन्द, सुश्री सम्बोधि  परमानन्द, सुश्री साधिका  परमानन्द, सुश्री सारिका  परमानन्द, सुश्री पूजा  परमानन्द, सुश्री कामिनी परमानन्द, डॉ. पुरुषोत्तम अग्रवाल, श्री सोमेश अग्रवाल, श्री संतोष चौपड़ा, श्री अनिल गोयल, श्री विक्रम चोयल, श्री तुलसी जी, श्री नसीब सिंह सैनी, श्रीमती राजकुमारी, श्री चमनलाल जी, श्रीमती शर्मीला जी ने भी व्यासपीठ को नमन करते हुए पूज्या दीदी माँ जी का आशीर्वाद प्राप्त किया।
पूज्या दीदी माँ जी ने भगवान श्रीकृष्ण के गोकुल पहुँचने पर वहाँ आनन्दोत्सव का भावपूर्ण वर्णन करते हुए भारत के प्राचीन सामाजिक जीवन की चर्चा की।उन्होंने कहा कि -“बड़ा ही सुन्दर था हमारा प्राचीन भारत।  हमारे भारत के गाँवों  के लोग पूरे  गांव को अपना  परिवार मानते थे।  अगर किसी घर में खीर या कढ़ी बन रही है तो पूरे गांव में वो कटोरी में भर भरकर जाती थी। और फिर वो कटोरी खाली नहीं आती थी, उसमें कुछ न कुछ डलकर वापिस आता था। जब लोग बैठते थे तो सभी परिवारों के सुख-दुख की चर्चा होती थी। किसी गरीब परिवार में किसी बिटिया का विवाह होने पर गांव का बड़े से बड़ा व्यक्ति भी उस दिन के लिए अपनी कचहरी की तारीख तक बदलवा देता था कि हमारे घर में हमारे गांव में बारात आनी है और हमारे पूरे गांव की जिम्मेदारी है कि हमने उस बारात का स्वागत करना है। सुसंस्कृति से समृद्ध ऐसा था हमारा भारत।
ऊँची अट्टालिकाएँ बेशक नहीं होती थीं परन्तु बड़ा हृदय होता था। ना जाने कितने रिश्तेदार घरों में महीनों तक रुकते थे। रिश्तेदार जब जाते थे ना, तो घर के लोग  रो-रोकर  उनको विदा करते थे। ऐसा भारत, इतना उदार भारत, प्यार से भरा भारत, हँसता-खेलता भारत! अब तो एक रात के लिए कोई आ जाए तो घरवालों का मुँह बन जाता है।  हम इतने सुविधा भोगी हो गए हैं कि हम प्यार की कीमत भूल गए हैं।  गाँव के किसी भी बुजुर्ग को देखकर अगर वो आँख कठोर कर लेता था तो तरुणों के दिल धक-धक-धक करने लगते थे। इतना सम्मान बुजुर्गों का था कि  बच्चों को उनकी आँख से भी डर लगता था। उस प्यारे भारत का हमने सत्यानाश कर दिया। “भारत” की छाती पर “इंडिया” को बैठा दिया और पश्चिम के जगत की नकल करने लग गए हम। पश्चिम के तौर-तरीकों से तुम भारत में जीना चाहते हो। समस्या हमारी है तो समाधान भी हमें हमारी दृष्टि से ही करने होंगे। पश्चिम का जगत अपनी तरह का है। उनकी अपनी जीवनचर्या है। लेकिन हमें जो ऋषियों ने इतनी समृद्ध परंपरा दी थी, उसी पर चलकर हम सुखानुभूति के साथ जी सकते हैं।”
गोकुल में अपने बाल सखाओं के साथ यमुना किनारे कन्हैया की विभिन्न लीलाओं का वर्णन करते हुए दीदी माँ जी ने उन्हें प्रकृति संरक्षण से जोड़ते हुए कहा कि -“श्रीकृष्ण ने प्रकृति की रक्षा के लिए अपनी उंगली पर गोवर्धन किया था।  श्रीमद भागवत में बड़ी सुंदर कथा आती है  प्रभु ने कालिया मर्दन किया।  कृष्ण कौन हैं? जो काल के सिर पर खड़े होकर नृत्य कर सकें, वो कृष्ण हैं।  कृष्ण वो जिनके पास सुदर्शन चक्र चलाने की सामर्थ्य है, परन्तु वे हर पल बांसुरी भी अपने पास रखते हैं।  कृष्ण वो हैं जो कारागार की काली कोठरी में प्रकट होते हैं। जिनके जन्म से पहले ही उन्हें मारने के षड्यंत्र रचे गए लेकिन वो इतनी विपरीत परिस्थितियों के बीच में भी जीवन का उत्सव मनाते हैं।  कृष्ण वो हैं जिनके लिए अपना-पराया कोई नहीं।  कृष्ण वो हैं जो पलायन  भी करना जानते हैं और रास भी रचाना जानते हैं।  जो काल के कपाल पर भी नृत्य कर सके, वो हैं कृष्ण कन्हैया। उन्होंने जमुना के जल को निरापद किया।  आप सभी लोग जो यहां बैठे हो,  आप भी संकल्प करो कि काल से भयभीत हुए बिना महाकाल की आराधना करनी है। जो विष प्रकृति में घुल गया हैं, उसे दूर करना है।  नदियों को निरापद और अविरल बनाना है।  पृथ्वी में अच्छे बीज डालना है।  रासायनिक उर्वरकों के स्थान पर जैविक खाद का प्रयोग करना है।  अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए प्रकृति से खिलवाड़ बंद करना है।  अपने ऊपर अंकुश करो और  भगवान से सीखो कि उन्होंने कैसे यमुना मैया को निरापद बनाया, कालिया का मर्दन किया, गोवर्धन उठाकर प्रकृति का रक्षण किया।
तुम तरक्की किसको मानते हो? विनाश को तरक्की कह रहे हो। प्रकृति क्षुब्ध है। आसमान दग्ध है। नदियाँ रो रही हैं अपने उद्धार के लिए। और तुम्हारी पूजा-पाठ में भी दिखावा ज्यादा है, बुरा मत मानिएगा। इतने बड़े-बड़े गणपति बनाकर तुम जो विसर्जन करते हो नदियों में, सागरों में और इनके रासायनिक तत्वों के कारण तमाम जल स्रोत दूषित होते हैं।  पाँच तत्वों के आराधक हैं हम और उनका संतुलन बनाकर रखना हमारी जिम्मेदारी है। इसके लिए क्या करना है? तुम्हारी पूजा की प्रतिमा या जो भी पुष्प इत्यादि सामग्री हो उसे गड्ढा खोदकर भूमि में दबा दो। वो मिट्टी में मिलकर मिट्टी हो जाएंगे। पूजन सामग्री का अपमान भी नहीं होगा और तुम्हारी नदियों में वो कचरा भी इकट्ठा नहीं होगा जिसके कारण वो अवरुद्ध हो जाती हैं। हमेशा बुद्धि से उसकी तीक्ष्णता और उसके आकलन हर कार्य के साथ आपका आकलन होना जरूरी है।”
आज श्रीमद भागवत कथा के विभिन्न प्रसंगों के भावपूर्ण वर्णन के साथ ही पूज्या दीदी माँ जी ने संगीतमय भजनों  के साथ कंस के कारागार में श्रीकृष्ण के जन्म के बाद का प्रसंग, गोकुल में आनंद,  पूतना वध, ऊखल बंधन प्रसंग, गोकुल से वृन्दावन प्रस्थान, कालिया मर्दन का प्रस्तुतिकरण कर कथा सभागार को आनंदित कर दिया। विभिन्न कथा प्रसंगों की संगीतमय प्रस्तुतियों के बीच उपस्थित श्रद्धालुओं ने भावपूर्ण नृत्य भी किया। व्यासपीठ पर आरती के साथ ही कथा ने अपने पंचम दिवस में विश्राम लिया।
यह जानकारी संयोजक साध्वी शिरोमणि दीदी एवं सह-संयोजक श्री उमेश खंडेलवाल से प्राप्त हुई है।
अशोक पाण्डेय

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