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भगवान जगन्नाथ द्वारा कांची-विजय और छेरापहंरा की परम्पराः

-अशोक पाण्डेय
भारत के अन्यतम धाम पुरुषोत्तम क्षेत्र के बड़दाण्ड(चौड़ी सड़क)पर प्रतिवर्ष आषाढ़ शुक्ल द्वितीय तिथि को अनुष्ठित होती है भगवान जगन्नाथ की विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा जो सादगीभरे राजतंत्रीय परम्परा पर आध्यात्मिक व प्रताजांत्रिक मूल्यों की रक्षा का पावन संदेश है।रथयात्रा के दिन पुरी के गजपति महाराजा(राजाओं के राजा)श्रीश्री दिव्य सिंहदेव द्वारा तीनों ही रथों पर छेरापहंरा(चंदन मिश्रित पवित्र और शीतल जल का छिड़कावकर सोने की मूंठ वाले झाड़ू से)अटूट आस्था,विश्वास,अपार श्रद्धा और विनम्रतासहित झाड़ू देने का दायित्व निभाते हैं।भगवान जगन्नाथ द्वारा अपने गजपति पुरुषोत्तम देव की कांची-विजय के लिए स्वयं युद्ध में जाना कांची विजय और छेरापहंरा से जुड़ी एक रोचक कथा है। भी है। रथयात्रा से जुड़ी ऐसी ही एक अमर कहानी है गजपति राजा पुरुषोîाम देव और कांची की राजकुमारी पद्मावती की, जिसमें भगवान स्वयं अपने भञ्चत के सक्वमान की रक्षा करते हैं। कहते हैं कि वह समय ओडिशा साम्राज्य के वैभव का स्वर्णकाल था। पुरी के गजपति महाराज पुरुषोत्तम देव शञ्चितशाली शासक होने के साथ-साथ भगवान जगन्नाथ के अनन्य भञ्चत थे। उनका दिन भगवान के नाम से शुरू होता और भगवान की सेवा पर ही समाप्त। हर वर्ष आषाढ़ मास में जब पुरी की सड़कों पर भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के विशाल रथ निकलते, तब लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ती। उसी समय एक अनूठी परंपरा निभाई जाती है होता है। उसी समय दक्षिण भारत के शञ्चितशाली राज्य कांचीपुरम में राजा साल्व नरसिंह का शासन था। उनकी पुत्री पद्मावती रूप, गुण और विद्या में अनुपम थीं। जब कांची के दरबार में गजपति पुरुषोत्तम देव की वीरता और वैभव की चर्चा पहुंची, तब दोनों राजवंशों के बीच विवाह प्रस्ताव की बात चली। कांची नरेश ने प्रारंभ में सहमति दे दी। लेकिन कुछ समय बाद उनके दरबारियों ने उन्हें बताया कि ‘पुरी का राजा स्वयं रथ पर झाड़ू लगाता है।Ó यह सुनकर कांची नरेश का चेहरा बदल गया। उन्हें लगा कि जो व्यञ्चित झाड़ू लगाता हो, वह भला उनकी राजकुमारी के योग्य कैसे हो सकता है। उन्होंने इसे राजसी प्रतिष्ठा के विरुद्ध माना और विवाह प्रस्ताव ठुकरा दिया। जब यह समाचार पुरी पहुंचा, तो गजपति पुरुषोत्तम देव का हृदय आहत हो उठा। उन्हें अपने अपमान का दुख कम था, लेकिन भगवान की सेवा का अपमान सहन नहीं हुआ। कहा जाता है कि उसी समय राजगुरु ने राजा से कहा कि ‘महाराज, संसार नहीं समझता कि आप झाड़ू नहीं लगाते, बल्कि स्वयं जगन्नाथ महाप्रभु की सेवा करते हैं। सेवक होना अपमान नहीं, सबसे बड़ा गौरव है।Ó फिर भी राजा का मन व्यथित रहा। उन्होंने प्रण लिया कि इस अपमान का उत्तर अवश्य देंगे। कुछ समय बाद गजपति सेना कांची की ओर बढ़ी। किंतु पहली लड़ाई में पुरुषोत्तम देव को पराजय का सामना करना पड़ा। निराश होकर वे पुरी लौटे और सीधे जगन्नाथ मंदिर पहुंचे। मंदिर में उन्होंने भगवान के सामने सिर झुका दिया और कहा कि ‘प्रभु, यह युद्ध मेरे अहंकार का नहीं, आपकी सेवा के सम्क्वमान का है।Ó लोककथा कहती है कि उस रात मंदिर के सेवकों ने देखा कि भगवान जगन्नाथ और बलभद्र के विग्रहों के घोड़ों पर मिट्टी और पसीने के निशान थे। किसी को समझ नहीं आया कि ऐसा कैसे हुआ। अगले दिन राजा को संकेत मिला कि स्वयं भगवान उनके साथ युद्ध में जाएंगे। दूसरी बार जब गजपति सेना कांची की ओर बढ़ी, तब मार्ग में सैनिकों ने दो रहस्यमयी योद्धाओं को घोड़ों पर आगे-आगे जाते देखा। एक श्यामवर्ण और दूसरा गौरवर्ण। वे सेना को मार्ग दिखा रहे थे। रास्ते में एक वृद्धा ने उन दोनों योद्धाओं को दही-पखाल खिलाया। बाद में जब राजा वहां पहुंचे और उस वृद्धा ने उन योद्धाओं का वर्णन किया, तब राजा समझ गए कि वे स्वयं भगवान जगन्नाथ और बलभद्र थे। इस बार कांची पर विजय प्राप्त हुई। राजकुमारी पद्मावती को सम्क्वमानपूर्वक पुरी लाया गया। लेकिन अपमान की स्मृति अभी भी राजा के मन में जीवित थी। क्रोध में उन्होंने राजगुरु से कहा कि ‘इस राजकुमारी का विवाह किसी झाड़ू लगाने वाले से कर दो।Ó राजगुरु बुद्धिमान थे। उन्होंने कुछ नहीं कहा और समय की प्रतीक्षा करने लगे। एक वर्ष बीत गया। फिर पुरी में रथयात्रा आई। लाखों श्रद्धालुओं के बीच गजपति महाराज फिर सोने की झाड़ू लेकर भगवान के रथ के सामने खड़े थे। वे पूरे समर्पण से ‘छेरा पहंराÓ कर रहे थे। तभी राजगुरु राजकुमारी पद्मावती को लेकर वहां पहुंचे। उन्होंने ऊंचे स्वर में कहा कि राजकुमारी के लिए पूरे संसार में सबसे योग्य वर वही है, जो स्वयं भगवान जगन्नाथ का सबसे बड़ा सेवक हो और इस समय भगवान के रथ पर झाड़ू लगाने वाला यह सेवक और कोई नहीं, ओडिशा के गजपति महाराज हैं। राजा कुछ क्षण स्तब्ध रह गए। धीरे-धीरे उनके चेहरे पर मुस्कान आ गई। उनका क्रोध समाप्त हो चुका था। वहीं रथयात्रा के पवित्र वातावरण में राजगुरु ने राजा पुरुषोत्तम देव और राजकुमारी पद्मावती का विवाह संपन्न कराया। कहते हैं, उस समय पुरी की सड़कों पर जय जगन्नाथ के स्वर गूंज उठे थे। लोगों ने देखा कि भगवान ने अपने भञ्चत की सेवा को संसार के सबसे बड़े सम्क्वमान में बदल दिया। आज भी पुरी की रथयात्रा में जब गजपति महाराज सोने की झाड़ू से रथ साफ करते हैं, तब यह कथा लोगों को याद दिलाती है कि सच्चा वैभव सत्ता में नहीं, सेवा और विनम्रता में होता है।

 

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