
-अशोक पाण्डेय
श्रीक्षेत्र,शंखक्षेत्र,मर्त्य बैकुण्ठ,पुरुषोत्तम क्षेत्र कहें या श्रीजगन्नाथ पुरी धाम,यह प्राचीन काल से ही धर्म, दर्शन,साधना,आध्यात्मिक उन्नति, सनातनी संस्कारों और आत्म-निवेदन का प्रमुख केंद्र रहा है।यहां पर अनेक ऋषि,योगी, मुनि,सिद्धपुरुष और मानवेत्तर प्रकृति के महापुरुष आते रहे हैं।इसीलिए यह क्षेत्र साधना,सिद्धि तथा आत्ममुक्ति का पवित्र स्थल बन चुका है।शाश्वत सत्य तो यह है कि यह देवभूमि भगवान श्रीजगन्नाथ की लीला-भूमि है जहां पर वे अपनी माधुर्य लीला और ऐश्वर्य लीला से विश्व मानवता को प्रतिपल आकृष्ट करते रहते हैं।यह श्रीक्षेत्र धर्मकानन है।यह महोदधि का क्षेत्र धर्म,बौद्धिक ज्ञान,आध्यात्मिक उन्नति और वैदिक अध्ययन-अध्यापन का प्राचीन काल से ही एक प्रमुख और विशिष्ट केंद्र रहा है।यहां पर जगतगुरु आदिशंकराचार्य, चैतन्य, रामानुजाचार्य, जयदेव, विद्यापति,नानक,कबीर और गोस्वामी तुलसीदास जी आये और श्रीमंदिर के रत्नवेदी पर अपने-अपने इष्टदेवों के रुप में भगवान जगन्नाथ के दर्शन किये।वे सभी महाप्रभु की इच्छा से आये और उनकी अलौकिक महिमा को स्वीकार कर उनके अनन्य भक्त बन गये।
श्रीजगन्नाथ धाम पुरी में प्रतिवर्ष आषाढ शुक्ल द्वितीया को अनुष्ठित होनेवाली भगवान जगन्नाथ की विश्वप्रसिद्ध रथयात्रा सचमुच विश्व का सबसे बड़ा सांस्कृतिक महोत्सव है जिसे लगभग एक हजार वर्षों से इसे स्पष्ट रुप से देखा जाता रहा है।यह रथयात्रा धर्म,दर्शन और भक्ति की त्रिवेणी है।रथयात्रा के दिन जगन्नाथ भगवान अपने भक्तों से स्वयं आकर मिलते हैं और उन्हें मित्रवत भाव से अहंकार रहित अपनी भक्ति का पावन संदेश देते हैं।रथयात्रा को दशावतार यात्रा,पतितपावन यात्रा,जनकपुरी यात्रा, सुंदराचल यात्रा, घोष यात्रा,नव दिवसीय यात्रा तथा गुण्डिचा यात्रा भी कहते हैं।यह रथयात्रा विश्व की समस्त संस्कृतियों,सभ्यताओं,सम्प्रदायों और लौकिक सामाजिक मान्याताओं का समाहार होती है क्योंकि भगवान जगन्नाथ चतुर्धा देव रुप में जगत के नाथ हैं।विश्व मानवता के स्वामी हैं।विश्व मानवता की रक्षा,शांति और समृद्धि के केन्द्र बिन्दु हैं। वे अपने दारुविग्रह रुप में सौर, वैष्णव, शैव, शाक्त, गाणपत्य़, बौद्ध और जैन भी हैं।वे अवतार नहीं,अवतारी हैं।वे 16 कलाओं से परिपूर्ण हैं।वे अपने भक्तों की अटूट आस्था एवं विश्वास के इष्टदेव हैं।रथयात्रा के दिन वे रथारुढ होकर विश्व मानवता को शांति,एकता,मैत्री और समृद्धि का पावन संदेश देते हैं।
2026 की रथयात्रा आगामी 16 जुलाई को है।पद्मपुराण के अनुसार आषाढ़ मास के शुक्लपक्ष की द्वितीया तिथि सभी कार्यों के लिए सिद्धियात्री तिथि होती है।भगवान जगन्नाथ की विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा इसीलिए अपने आपमें विश्व का सबसे बड़ा सांस्कृतिक महोत्सव बनकर भगवान जगन्नाथ के प्रति वास्तविक श्रद्धा,भक्ति, प्रेम, आत्मनिवेदन, करुणा, लौकिक-अलौकिक विश्वास को बनोये रखने का संदेश है। मानव को भव-बंधन से मुक्ति, आत्मचेतना को पवित्र करने का सुअवसर होता है।रथयात्रा के दिन भोर में श्रीमंदिर के रत्नवेदी से चतुर्धादेव विग्रहों को एक-एककर पहण्डी विजय कराकर उनके अलग-अलग सुनिश्चित रथों पर आरुढ कराया जाता है। बलभद्रजी को तालध्वज रथ पर, सुभद्रा माता को तथा सुदर्शन जी को देवदलन रथ पर तथा भगवान जगन्नाथ को नंदिघोष रथ पर आरुढ कराया जाता है।रथयात्रा के दिन सबसे आगे तालध्वज रथ चलता है।उसके पीछे देवदलन रथ तथा सबसे आखिर में भगवान जगन्नाथ का रथ नंदिघोष रथ चलता है।
प्रतिवर्ष तीनों रथ नये बनाये जाते हैं और पुराने रथों को तोड़ दिया जाता है।तीनों रथों पर पार्श्वदेवगण प्रतिवर्ष नये बनते हैं। ऋग्वेद तथा यजुर्वेद में रथ के उपयोग का वर्णन मिलता है।रथ निर्माण के लिए काष्ठसंग्रह का पवित्र कार्य़ प्रतिवर्ष वसंतपंचमी से आरंभ होता है।काष्ठसंग्रह दशपल्ला के जंगलों से प्रायः होता है।रथनिर्माण का कार्य वंशपरम्परानुसार भोईसेवायतगण अर्थात् श्रीमंदिर से जुडे बढईगण ही करते हैं। उनको पारिश्रमिक के रुप में पहले जागीर दी जाती थी लेकिन जागीर प्रथा समाप्त होने के बाद उन्हें अब श्रीमंदिर की ओर से पारिश्रमिक दिया जाता है।रथ-निर्माण में कुल लगभग 205 प्रकार के सेवायतगण सहयोग करते हैं।
कहते हैं कि जिस प्रकार पांच तत्वों के योग से मानव शरीर का निर्माण हुआ है ठीक उसी प्रकार से पांच तत्वःकाष्ठ,धातु,रंग,परिधान तथा सजावटी सामग्रियों के योग से रथों का निर्माण होता है ।रथनिर्माण का कार्य पुरी के गजपति महाराजा श्री श्री दिव्य सिंहदेवजी के राजमहल श्रीनाहर के ठीक सामने रखखल्ला में होता है।रथयात्रा के एक दिन पूर्व आषाढ शुक्ल प्रतिपदा के दिन तीनों रथों को खीचकर लाकर श्रीमंदिर के सिंहद्वार के सामने उत्तर दिशा की ओर मुंह करके खड़ा कर दिया जाता है।पहण्डी विजय कराकर चतुर्धा देवविग्रहों को रथारुढ़ कराया जाता है।पुरी गोवर्द्धन पीठ के 145वें पीठाधीश्वर जगतगुरु शंकराचार्य पुरी स्वामी निश्चलानंद सरस्वती महाभाग अपने परिकरों के साथ गोवर्द्धन मठ से आकर तीनों रथों पर एक-एककर जाकर रथों की सुव्यवस्था का अवलोकन करते हैं। चतुर्धा देवविग्रहों को अपना आत्मनिवेदन प्रस्तुत करते हैं।उसके उपरांत जगन्नाथ जी के प्रथम सेवक पुरी के गजपति महाराजा श्री श्री दिव्य सिंहदेवजी महाराजा अपने राजमहल श्रीनाहर से पालकी पर सवार होकर आते हैं और तीनों रथों पर चंदनमिश्रित जल छिडकर छेरापंहरा का पवित्र दायित्व निभाते हैं।
रथों को घोड़ों के साथ जोत दिया जाता है। तीनों रथों को इसप्रकार सूक्ष्म कोण से अगल-बगल ऐसे खडा किया जाता है कि रथों के रस्सों को खीचने में बडदाण्ड अर्थात् श्रीमंदिर के सिंहद्वार के ठीक सामने की चौडी और बड़ी सड़क के बीचोंबीच ही तीनों रथ चलें।रथ-संचालन के लिए झण्डियों को हिला-हिलाकर निर्देश दिया जाता है।“ जय जगन्नाथ“और हरिबोल के जयघोष के साथ रथयात्रा आरंभ होती है। रथ खीचते समय रस्से दो प्रकार के उपयोग में लाये जाते हैं। एक सीधे रस्से तथा दूसरे घुमामवदार रस्से।तीनों रथों में चार-चार रस्से लगे होते हैं जिनको विभिन्न चक्कों के अक्ष से विशेष प्रणाली से लपेटकर और गांठ डालकर बांधा जाता है। गुण्डिचा मंदिर जाने के रास्ते में भगवान जगन्नाथ रास्ते में अपनी मौसी के हाथों से बना पूड़पीठा ग्रहण करते हैं। वे सात दिनों तक गुण्डिचा मंदिर में विश्राम करते हैं।
श्रीमंदिर प्रशासन पुरी से प्राप्त जानकारी के अनुसार भगवान जगन्नाथ की बाहुड़ा यात्रा(वापसी श्रीमंदिर यात्रा) 24 जुलाई को है जबकि उनका सोनावेश 25 जुलाई को,अधरपड़ा 26 जुलाई को तथा नीलाद्रि विजय-27 जुलाई को है।
-अशोक पाण्डेय











